
"क्या सच में मोदी सरकार का अंत करीब है?" यह सवाल आज भारतीय राजनीति के गलियारों से लेकर आम जनता की चौपालों तक गूंज रहा है। 2014 में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक दशक तक एकछत्र राज किया। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों ने एक नई राजनीतिक हकीकत पेश की है। चुनाव पूर्व एग्जिट पोल्स में '400 पार' का दावा करने वाली भाजपा अपना संसदीय बहुमत खो बैठी और उसे सत्ता में बने रहने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के अपने सहयोगियों पर निर्भर होना पड़ा।
जब हम पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं, आर्थिक नीतियों, विपक्ष के आरोपों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टिंग का विश्लेषण करते हैं, तो कई अहम परतें खुलती हैं। यह लेख सिर्फ दावों पर नहीं, बल्कि उन ठोस तथ्यों पर आधारित है जो बताते हैं कि आखिर क्यों दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेताओं में शुमार होने के बावजूद, मोदी सरकार के खिलाफ असंतोष का नैरेटिव मजबूत हो रहा है।
बड़े वादे – क्या पूरा हुआ, क्या अधूरा रह गया?
2014 और 2019 के आम चुनावों में मोदी सरकार ने जनता से कई लोकलुभावन वादे किए थे, जिनमें हर साल दो करोड़ रोजगार, काले धन की वापसी, किसानों की आय दोगुनी करना और महंगाई पर लगाम लगाना प्रमुख थे। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से काफी अलग नजर आती है।
रोजगार और महंगाई: जनवरी 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर 4.8% है। यह आंकड़ा ऊपरी तौर पर सामान्य लग सकता है, लेकिन इसके भीतर की असमानता चिंताजनक है। शहरी बेरोजगारी 6.7% तक है, और सबसे डराने वाला आंकड़ा युवाओं का है, जहां 15 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में बेरोजगारी दर 13% से 17% के बीच बनी हुई है। भारत जैसे युवा देश (Demographic dividend) के लिए यह एक स्ट्रक्चरल संकट है, क्योंकि पढ़े-लिखे युवाओं को उनकी योग्यता के अनुसार काम नहीं मिल रहा है। वहीं, एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार ही 2017 में बेरोजगारी दर 45 वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी, जिसे नोटबंदी और जीएसटी (GST) के प्रभावों से जोड़कर देखा गया था।
किसानों की आय और असमानता: आर्थिक विकास दर (GDP) 7% के आसपास रहने के बावजूद इसका फायदा समाज के हर वर्ग को समान रूप से नहीं मिला है। ऑक्सफैम और अन्य रिपोर्ट्स के हवाले से यह साफ हो चुका है कि भारत में आर्थिक असमानता ऐतिहासिक स्तर पर है। एक तरफ जहां 2010 में देश की शीर्ष 1% आबादी के पास 40% संपत्ति थी, वहीं 2016 तक यह बढ़कर 58% हो गई।
भ्रष्टाचार के आरोप
मोदी सरकार खुद को 'भ्रष्टाचार मुक्त' सरकार के रूप में पेश करती रही है, लेकिन हाल के वर्षों में कुछ ऐसे खुलासे हुए हैं जिन्होंने इस छवि पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
अडाणी-हिंडनबर्ग विवाद (Adani-Hindenburg Saga): जनवरी 2023 में अमेरिकी शॉर्ट-सेलर फर्म हिंडनबर्ग रिसर्च ने गौतम अडाणी के नेतृत्व वाले समूह पर "दशकों तक स्टॉक हेरफेर और अकाउंटिंग धोखाधड़ी" का आरोप लगाया। इस रिपोर्ट के आते ही अडाणी समूह के शेयरों में भारी गिरावट आई और समूह का मार्केट वैल्यूएशन 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा गिर गया। विपक्ष ने इस मुद्दे को संसद में जोर-शोर से उठाया और संयुक्त संसदीय समिति (JPC) से जांच की मांग की। विपक्ष का सीधा आरोप था कि सरकार की नीतियों ने एक खास उद्योगपति को फायदा पहुंचाया है।
इलेक्टोरल बांड (Electoral Bonds) का पर्दाफाश: भ्रष्टाचार के आरोपों में सबसे बड़ा धमाका 'इलेक्टोरल बांड' ने किया। 2017 में वित्त अधिनियम के जरिए लाए गए इस बांड ने राजनीतिक दलों को गुमनाम और असीमित चंदा लेने की छूट दे दी। रिज़र्व बैंक (RBI) और चुनाव आयोग (ECI) की चेतावनियों के बावजूद इसे लागू किया गया।
15 फरवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने इस योजना को 'असंवैधानिक' करार देते हुए रद्द कर दिया और स्टेट बैंक (SBI) को सारा डेटा सार्वजनिक करने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह बांड मतदाताओं के 'सूचना के अधिकार' (Article 19(1)(a)) का उल्लंघन है। डेटा सामने आने के बाद कई चौंकाने वाले 'क्विड प्रो को' (Quid Pro Quo - लेन-देन) के मामले सामने आए। कई ऐसी कंपनियों ने करोड़ों का चंदा दिया, जिन पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) या सीबीआई (CBI) की छापेमारी हुई थी। उदाहरण के लिए, एक फार्मा कंपनी के निदेशक की शराब घोटाले में गिरफ्तारी के बाद उनकी कंपनी ने करोड़ों रुपये के बांड खरीदे, और बाद में वे सरकारी गवाह बन गए। यह सीधे तौर पर सरकारी एजेंसियों द्वारा 'वसूली' (Extortion) और शेल कंपनियों के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग की ओर इशारा करता है।
अंतरराष्ट्रीय विवाद और वैश्विक कनेक्शन
वैश्विक राजनीति में भी भारतीय नेताओं के नाम कुछ विवादित अंतरराष्ट्रीय शख्सियतों के साथ जुड़े, जिन्होंने मीडिया में खासी सुर्खियां बटोरीं।
जेफरी एपस्टीन (Jeffrey Epstein) मामले में भारतीय नाम: अमेरिका की हाउस ओवरसाइट कमेटी द्वारा जारी किए गए दस्तावेजों और 'ड्रॉप साइट न्यूज' (Drop Site News) द्वारा प्राप्त किए गए जेफरी एपस्टीन (एक कुख्यात और सजायाफ्ता यौन अपराधी) के 18,000 ईमेल्स के खुलासे से भारतीय राजनीति में हलचल मच गई। इन रिपोर्ट्स के अनुसार, अपनी गिरफ्तारी से मात्र दो महीने पहले मध्य 2019 में, एपस्टीन ने व्हाइट हाउस के पूर्व रणनीतिकार स्टीव बैनन और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच एक बैठक तय कराने की पेशकश की थी।
रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि 2017 में एपस्टीन और भारतीय उद्योगपति (और एशिया के सबसे अमीर शख्स मुकेश अंबानी के भाई) अनिल अंबानी के बीच ईमेल्स का आदान-प्रदान हुआ था, जिसमें पीएम मोदी के अमेरिकी दौरे और भारत-इज़राइल रणनीति का जिक्र था। इसके अलावा, वर्तमान मोदी सरकार में मंत्री और पूर्व राजनयिक हरदीप सिंह पुरी का नाम भी जून 2014 से जनवरी 2017 के बीच कम से कम पांच बार एपस्टीन के अपॉइंटमेंट कैलेंडर में दर्ज पाया गया।
राजनीति में झूठ और प्रचार – क्या सच और क्या नैरेटिव?
सत्ताधारी पार्टी ने मीडिया और नैरेटिव मैनेजमेंट का बेहद प्रभावी इस्तेमाल किया है। विदेश नीति, जो कभी कूटनीतिक दायरों तक सीमित थी, उसे घरेलू चुनावी रैलियों का मुख्य हथियार बना दिया गया।
विदेश नीति का घरेलू इस्तेमाल: पुलवामा आतंकी हमले के बाद 2019 में पाकिस्तान के बालाकोट में की गई 'सर्जिकल स्ट्राइक' को 2019 के आम चुनावों में जमकर भुनाया गया। पीएम मोदी ने खुद को 'चौकीदार' के रूप में पेश किया। इसी तरह 2023 में भारत की G20 अध्यक्षता को एक अभूतपूर्व वैश्विक सफलता के रूप में प्रचारित किया गया। G20 का लोगो, जिसमें कमल (जो संयोग से भाजपा का चुनाव चिह्न भी है) को शामिल किया गया था, पूरे देश में प्रदर्शित किया गया।
लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण: प्रचार के शोर के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान भी पहुंचा है। 2021 में स्वीडन के V-Dem इंस्टिट्यूट ने भारत को एक 'चुनावी निरंकुशता' (Electoral Autocracy) वाले देश की श्रेणी में डाल दिया। आरोप है कि सरकार ने अपने आलोचकों और मीडिया को दबाने के लिए UAPA जैसे कड़े कानूनों और राजद्रोह के मामलों का बेतहाशा इस्तेमाल किया है। 2014 के बाद राजद्रोह के मामलों में भारी उछाल आया है। केंद्रीय जांच एजेंसियों (CBI, ED) का 95% इस्तेमाल केवल विपक्षी नेताओं के खिलाफ किया गया। यह नैरेटिव गढ़ा गया कि जो सरकार के खिलाफ है, वह 'देश विरोधी' है।
जनता की नाराज़गी या राजनीतिक नैरेटिव?
जमीनी स्तर पर जनता की वास्तविक समस्याओं ने सरकार के नैरेटिव को कड़ी चुनौती दी है:
- बेरोजगारी और महंगाई: जैसा कि ऊपर उल्लेखित है, बेरोजगारी का दंश युवाओं में हताशा पैदा कर रहा है। साथ ही महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।
- किसान आंदोलन: 2020-21 का ऐतिहासिक किसान आंदोलन मोदी सरकार के लिए एक बड़ा झटका था, जब देश भर के किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर महीनों तक डेरा डाले रखा और सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेने पड़े। अब 'किसान आंदोलन 2.0' (Farmer Protests 2.0) में किसान फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी और एमएस स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू करने की मांग कर रहे हैं।
- सामाजिक ध्रुवीकरण: राजनीतिक फायदे के लिए बहुसंख्यकवाद (Hindutva) का कार्ड खेला गया। 2024 के चुनाव प्रचार में तो प्रधानमंत्री ने खुले तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाते हुए उन्हें विपक्षी दल का 'जिहादी वोट बैंक' तक कह डाला। इस तरह के सामाजिक ध्रुवीकरण ने समाज में दरारें पैदा की हैं।
क्या सच में मोदी सरकार का अंत करीब है?
2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम एक स्पष्ट संकेत हैं कि 'मोदी मैजिक' अब अजेय नहीं रहा। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे अहम राज्यों में भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा। अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के बावजूद, फैजाबाद (जहां अयोध्या स्थित है) की सीट भाजपा हार गई, जो यह दर्शाता है कि केवल धार्मिक भावनाओं के सहारे आर्थिक और बुनियादी सवालों को नहीं दबाया जा सकता। चुनाव जीतने के लिए भाजपा को जेडीयू (JDU) और टीडीपी (TDP) जैसे सहयोगियों के बैसाखी की जरूरत पड़ी।
विपक्ष की स्थिति अब पहले से बहुत मजबूत है। 'INDIA' गठबंधन ने बेरोजगारी, संविधान बचाने और सामाजिक न्याय (जातिगत जनगणना) के मुद्दे को सफलतापूर्वक आम जनता तक पहुंचाया है।
निष्कर्ष
मोदी सरकार का सफर बड़े वादों से शुरू होकर, इलेक्टोरल बांड जैसे बड़े विवादों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक उलझनों तक आ पहुंचा है। विपक्ष ने सरकार के खिलाफ एक मजबूत नैरेटिव सेट कर दिया है। सरकार तुरंत गिरने वाली नहीं है, लेकिन उसका 'अजेय' होने का भ्रम टूट चुका है। अब सत्ताधारी दल को हर कदम सहयोगियों और मजबूत विपक्ष के दबाव में फूंक-फूंक कर रखना होगा।
अंत में हर भारतीय मतदाता और राजनीतिक विश्लेषक के जहन में बस एक ही सवाल है— "क्या भारत में राजनीतिक बदलाव आने वाला है?" इसका जवाब 2024 के परिणामों ने दे दिया है; बदलाव की शुरुआत हो चुकी है, अब देखना यह है कि यह बदलाव सत्ता के गलियारों को कितनी गहराई तक प्रभावित करता है।
