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क्या एक व्यक्ति की वैचारिक मुखरता पूरे समाज की चेतना को बदल सकती है? जब हम 20वीं सदी के भारत के सामाजिक इतिहास को पलटते हैं, तो एक नाम पूरी प्रखरता के साथ उभरता है— ई.वी. रामासामी, जिन्हें दुनिया सम्मान से 'पेरियार' कहती है। वे केवल एक राजनेता या विद्रोही नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे तर्कवादी थे जिन्होंने सदियों से चली आ रही सामाजिक रूढ़ियों पर सवाल खड़े किए।
पेरियार का मानना था कि आत्म-सम्मान, राजनीतिक स्वतंत्रता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। आज के इस विशेष लेख में हम पेरियार ई.वी. रामासामी का जीवन परिचय विस्तार से जानेंगे और समझेंगे कि कैसे उनके विचारों ने दक्षिण भारत के सामाजिक और राजनीतिक भूगोल को एक नई दिशा दी।
1. जन्म, परिवार और प्रारंभिक पृष्ठभूमि
पेरियार का जन्म 17 सितंबर 1879 को मद्रास प्रेसिडेंसी के इरोड (वर्तमान तमिलनाडु) में हुआ था। उनका पूरा नाम इरोड वेंकटप्पा रामासामी था।
पारिवारिक पृष्ठभूमि: वे एक संपन्न कन्नड़ भाषी बलिजा नायडू परिवार से थे। उनके पिता वेंकटप्पा नायकर एक सफल व्यापारी थे। घर का माहौल धार्मिक था, जहाँ अक्सर प्रवचन और शास्त्रार्थ होते रहते थे।
शिक्षा: रामासामी की औपचारिक शिक्षा केवल प्राथमिक स्तर (5वीं कक्षा) तक ही रही। हालांकि, उनके भीतर की जिज्ञासा और तार्किकता बचपन से ही दिखने लगी थी। वे अक्सर अपने घर आने वाले धार्मिक पंडितों से परंपराओं की प्रासंगिकता पर कठिन सवाल पूछते थे।
प्रारंभिक कार्य: कम उम्र में ही वे अपने पिता के व्यवसाय से जुड़ गए, लेकिन उनका मन समाज की विषमताओं को समझने में अधिक रमा रहा।
2. काशी यात्रा: एक वैचारिक मोड़
पेरियार के जीवन की दिशा बदलने में 1904 की काशी (वाराणसी) यात्रा की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। हालांकि इस यात्रा के विवरणों में बाद के साहित्य में भावनात्मक जुड़ाव अधिक दिखता है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह स्पष्ट है कि वहाँ हुए भेदभाव के अनुभवों ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला।
भोजनालयों में जाति के आधार पर किए गए भेदभाव और धर्म के नाम पर व्याप्त पाखंड को देखकर वे काफी आहत हुए। इस घटना ने उनके भीतर तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के प्रति एक गहरा आक्रोश पैदा किया और उनके भीतर 'ईश्वर' और 'धर्म' की प्रचलित परिभाषाओं को चुनौती देने की तार्किक शक्ति को जन्म दिया।
3. राजनीतिक सफर और कांग्रेस से अलगाव
1919 में पेरियार महात्मा गांधी के अहिंसक सिद्धांतों और खादी के आह्वान से प्रभावित होकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। उन्होंने असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की और शराबबंदी के समर्थन में अपने परिवार के ताड़ी व्यवसाय का त्याग कर बड़ा आर्थिक नुकसान उठाया।
विवाद और विदाई:
कांग्रेस के भीतर रहते हुए पेरियार ने महसूस किया कि दलितों और पिछड़ों के अधिकारों के प्रति पार्टी का रवैया उदासीन है। विशेष रूप से 'चेरनमहादेवी गुरुकुल' की घटना, जहाँ छात्रों के साथ भोजन के दौरान जातिगत भेदभाव किया जाता था, ने उन्हें व्यथित कर दिया। 1925 में, जब कांग्रेस ने पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण के उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, तो उन्होंने पार्टी छोड़ दी और अपनी अलग राह चुनी।
4. वैकोम सत्याग्रह: सड़कों पर सम्मान की लड़ाई
1924-25 का वैकोम सत्याग्रह (वर्तमान केरल) पेरियार के जीवन का एक स्वर्णिम अध्याय है। यह आंदोलन मंदिर प्रवेश से अधिक 'नागरिक अधिकारों' की लड़ाई थी।
संघर्ष: वैकोम मंदिर के आसपास की सड़कों पर दलितों के चलने पर पाबंदी थी। पेरियार ने इस प्रतिबंध के खिलाफ मोर्चा संभाला और कई बार जेल गए।
परिणाम: इस लंबी लड़ाई के बाद प्रशासन को झुकना पड़ा और मंदिर के आसपास की सड़कें सभी जातियों के लिए खोल दी गईं। हालांकि, पूर्ण मंदिर प्रवेश की अनुमति बहुत बाद में (1936) मिली, लेकिन वैकोम की इस जीत ने पेरियार को 'सामाजिक न्याय' का एक बड़ा चेहरा बना दिया।
5. आत्म-सम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement)
1925 में पेरियार ने 'आत्म-सम्मान आंदोलन' (Self-Respect Movement) की नींव रखी। यह आंदोलन केवल जाति के खिलाफ नहीं था, बल्कि यह मानसिक गुलामी के खिलाफ एक युद्ध था।
उनके विचार के प्रमुख बिंदु:
तर्कवाद: वे कहते थे कि किसी भी बात को केवल इसलिए न मानें क्योंकि वह किसी ग्रंथ में लिखी है, बल्कि उसे तर्क की कसौटी पर कसें।
आत्म-सम्मान विवाह: उन्होंने बिना किसी पुरोहित और धार्मिक कर्मकांड के विवाह की प्रथा शुरू की, जिसे 'आत्म-सम्मान विवाह' कहा गया।
नारीवाद: पेरियार ने महिलाओं की शिक्षा, संपत्ति के अधिकार और विधवा विवाह का पुरजोर समर्थन किया। वे मानते थे कि पितृसत्ता ही समाज की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है।
6. द्रविड़ कड़गम की स्थापना और द्रविड़ पहचान
1944 में पेरियार ने 'जस्टिस पार्टी' का नाम बदलकर 'द्रविड़ कड़गम' (DK) कर दिया। उन्होंने दक्षिण भारतीयों के बीच 'द्रविड़ अस्मिता' को जगाया। उनका नारा था— "कोई भी ऊँचा नहीं है, कोई भी नीचा नहीं है, सब समान हैं।" उनके इस आंदोलन ने आगे चलकर तमिलनाडु की पूरी राजनीति को बदल दिया, जिससे बाद में DMK और AIADMK जैसी पार्टियों का उदय हुआ।
7. रोचक और महत्वपूर्ण तथ्य (Interesting Facts)
उपाधि: 1938 में मद्रास में महिलाओं के एक सम्मेलन में उन्हें 'पेरियार' (महान व्यक्ति) के रूप में संबोधित किया गया।
विशिष्ट संबोधन: 1970 के दशक में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में उनके मानवतावादी कार्यों के लिए उन्हें “नए युग का पैगंबर” और “दक्षिण-पूर्व एशिया का सुकरात” जैसे विशेषणों से अलंकृत किया गया।
संसद में सम्मान: भारतीय संसद के परिसर में उनका भव्य चित्र (Portrait) स्थापित है, जो राष्ट्रीय स्तर पर उनके योगदान की स्वीकृति है।
लेखन: उन्होंने 'कुडी अरासू' (Kudi Arasu) और 'विदुथलाई' (Viduthalai) जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से अपने क्रांतिकारी विचारों को जन-जन तक पहुँचाया।
8. मृत्यु और उसके बाद का प्रभाव
24 दिसंबर 1973 को 94 वर्ष की आयु में पेरियार का निधन हुआ। उनके निधन के बाद भी उनकी विचारधारा कमजोर नहीं पड़ी। आज दक्षिण भारत की शिक्षा पद्धति, महिला सशक्तिकरण और आरक्षण व्यवस्था में पेरियार की स्पष्ट झलक देखी जा सकती है।
उन्होंने जो योगदान दिया, वह आज भी आधुनिक समाज सुधारकों के लिए एक मार्गदर्शिका (Manual) की तरह काम करता है। उन्हें एक ऐसे बहुजन महापुरुष के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने मनुष्य के विवेक को जगाने का काम किया।
9. निष्कर्ष: क्यों आज भी जरूरी हैं पेरियार?
पेरियार का जीवन संघर्ष हमें सिखाता है कि सामाजिक बदलाव के लिए साहस और तर्क दोनों की आवश्यकता होती है। पेरियार ई.वी. रामासामी का जीवन परिचय हमें यह याद दिलाता है कि जब तक समाज में ऊँच-नीच और भेदभाव रहेगा, तब तक उनके विचार प्रासंगिक बने रहेंगे।
वे एक सच्चे अर्थों में 'तर्कवादी' थे, जिन्होंने धर्म और परंपरा के नाम पर होने वाले शोषण को चुनौती दी। आज जब हम लोकतांत्रिक मूल्यों और समानता की बात करते हैं, तो पेरियार के सिद्धांत हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और स्वाभिमान से जीने की प्रेरणा देते हैं।
प्रमुख संदर्भ (Authoritative References):
Periyar: The Political Biography – Bala Jayaraman
The Dravidian Pathway - Vignesh Rajahmani
Caste and The crises of Dignity – Periyar Ramasami Speaks
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. पेरियार का सबसे बड़ा योगदान क्या माना जाता है?
उनका सबसे बड़ा योगदान पिछड़ी जातियों में 'आत्म-सम्मान' की भावना जगाना और द्रविड़ पहचान को पुनर्स्थापित करना है।
2. पेरियार और बाबासाहेब अंबेडकर की विचारधारा में क्या समानता है?
दोनों ही महापुरुष जाति उन्मूलन, महिलाओं के अधिकार और शिक्षा के माध्यम से सामाजिक समानता लाने के पक्षधर थे।
3. क्या पेरियार ने कोई चुनाव लड़ा था?
नहीं, पेरियार ने कभी चुनाव नहीं लड़ा। उन्होंने अपना पूरा जीवन एक 'सामाजिक सुधारक' और 'विचारक' के रूप में ही बिताया।

