
भारतीय राजनीति में दलित वोट बैंक हमेशा से सत्ता की चाबी रहा है। हाल ही में, बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर अब तक का सबसे तीखा राजनीतिक हमला बोला है। राहुल गांधी द्वारा बसपा संस्थापक मान्यवर कांशीराम को 'भारत रत्न' देने की मांग का प्रस्ताव पास किए जाने के बाद, मायावती ने पलटवार करते हुए कांग्रेस को उसकी ऐतिहासिक गलतियों की याद दिलाई है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि जिस कांग्रेस की 'दलित विरोधी' सोच के कारण ही बसपा का गठन करना पड़ा था, वह आज केवल राजनीतिक स्वार्थ के लिए घड़ियाली आंसू बहा रही है। बहुजन समाज के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर इस नए राजनीतिक टकराव के पीछे की असली वजह और इतिहास क्या है।
मुख्य खबर
दरअसल, यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब कांग्रेस ने पहली बार लखनऊ में मान्यवर कांशीराम जी की जयंती पर एक कार्यक्रम आयोजित किया और उन्हें भारत रत्न देने की मांग उठाई। इस कार्यक्रम में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि अगर जवाहरलाल नेहरू जिंदा होते तो कांशीराम कांग्रेस के मुख्यमंत्री होते।
इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर लिखा कि कांग्रेस का यह रवैया केवल एक छलावा है। उन्होंने कुछ कठोर तथ्य जनता के सामने रखे:
- बाबा साहेब का अपमान: कांग्रेस दशकों तक केंद्र की सत्ता में रही, लेकिन उसने कभी भी संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर को भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया।
- राष्ट्रीय शोक नहीं: जब मान्यवर कांशीराम का निधन हुआ था, तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन उन्होंने एक दिन का भी राष्ट्रीय शोक घोषित नहीं किया।
- आरक्षण पर खामोशी: मायावती ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा SC/ST आरक्षण में सब-क्लासिफिकेशन (क्रीमी लेयर) की अनुमति देने वाले फैसले पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (SP) की चुप्पी को उनकी 'आरक्षण विरोधी' मानसिकता का प्रमाण बताया।
- घड़ियाली आंसू: सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस को अचानक दलितों की याद आ रही है, जो केवल उनके पाखंड को दर्शाता है।
मायावती और कांग्रेस के संबंधों का इतिहास
कांग्रेस और दलित राजनीति का इतिहास हमेशा से जटिल और विरोधाभासी रहा है। ऐतिहासिक रूप से देखें तो डॉ. अंबेडकर और कांग्रेस (विशेषकर गांधी जी) के बीच दलितों के प्रतिनिधित्व को लेकर गहरे मतभेद रहे थे, जिसका चरम रूप 1932 का 'पूना पैक्ट' था। आज़ादी के बाद भी कांग्रेस ने दलितों को केवल एक वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया, लेकिन नेतृत्व हमेशा सवर्ण जातियों के हाथों में ही रखा।
1970 और 80 के दशक तक कांग्रेस का दलितों पर एकाधिकार था। लेकिन कांशीराम ने महसूस किया कि कांग्रेस दलितों को केवल सत्ता की सीढ़ी बना रही है, उन्हें सत्ता के सिंहासन पर कभी नहीं बैठाएगी। इसी दलित विरोधी और मनुवादी सोच को चुनौती देने के लिए कांशीराम ने पहले BAMCEF (1973) और फिर 1984 में 'बहुजन समाज पार्टी' (BSP) की स्थापना की। कांग्रेस के लंबे शासनकाल में उपेक्षा के कारण ही बहुजन समाज को अपनी एक स्वतंत्र राजनीतिक आवाज़ की जरूरत महसूस हुई थी।
दलित राजनीति पर इसका प्रभाव
2024 के लोकसभा चुनावों में दलित राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। उत्तर प्रदेश, जहां 21% दलित वोटर हैं और 84 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं, वहां बसपा का वोट शेयर गिरकर मात्र 9.4% रह गया और पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। बसपा के इस पतन का सीधा फायदा 'इंडिया गठबंधन' (सपा और कांग्रेस) को हुआ। अखिलेश यादव के 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और कांग्रेस के 'संविधान बचाओ' अभियान ने दलित वोटरों के एक बड़े हिस्से को अपनी ओर खींच लिया।
मायावती का यह ताज़ा हमला इसी छिटकते वोट बैंक को वापस लाने की एक रणनीतिक कोशिश है। वह बहुजन समाज को यह याद दिलाना चाहती हैं कि कांग्रेस और सपा, दोनों ही दलों के राजनीतिक चरित्र में ईमानदारी का अभाव है और वे केवल 'प्रतीकात्मक राजनीति' करते हैं।
विशेषज्ञ या राजनीतिक विश्लेषण
जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार का यह विश्लेषण इस मुद्दे की गहराई को समझाता है। उनका कहना है कि "कांग्रेस इस देश में 70 वर्षों तक सत्ता में रही, तब उसे दलितों की कभी याद नहीं आई। आज जब सत्ता से बाहर हो चुके हैं, तो दलित महापुरुषों को याद करने का नाटक कर रहे हैं"।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जहां कांग्रेस सत्ता में है, वहां वह दलितों को 'क्रीम पोस्ट' (महत्वपूर्ण पदों) पर नहीं बैठाती। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने भी अपने शासनकाल में बसपा द्वारा बहुजन संतों और गुरुओं के नाम पर बनाए गए स्मारकों और जिलों के नाम बदल दिए थे। मायावती ने स्पष्ट किया है कि 2 जून 1995 का 'गेस्ट हाउस कांड' सपा के राजनीतिक चरित्र पर लगा एक स्थायी दाग है। इसलिए, कांग्रेस और सपा का दलित प्रेम केवल चुनावी अवसरवादिता है।
समाज के लिए महत्व
समाज के लिए मायावती का यह बयान एक चेतावनी (Wake-up call) है। जब भी दलित समाज अपने स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व (BSP) से दूर होकर मुख्यधारा की पार्टियों (कांग्रेस या भाजपा) के पीछे चलता है, तो उसके मूल मुद्दे—जैसे आरक्षण की रक्षा, जातिगत जनगणना और भूमिहीन दलितों का आर्थिक उत्थान—हाशिए पर चले जाते हैं।
कांग्रेस द्वारा कांशीराम जयंती मनाना इस बात का संकेत है कि स्थापित पार्टियां अब बहुजन नायकों को 'हाइजैक' करने की कोशिश कर रही हैं। बहुजन समाज को यह समझना होगा कि क्या उन्हें प्रतीकात्मक सम्मान (जैसे भारत रत्न की मांग) चाहिए या फिर ठोस राजनीतिक और सामाजिक हिस्सेदारी?
Conclusion
मायावती का कांग्रेस और सपा पर हमला केवल एक चुनावी बयानबाज़ी नहीं है, बल्कि बहुजन राजनीति के अस्तित्व की लड़ाई है। यह सच है कि कांग्रेस का इतिहास दलित नेतृत्व को उभरने से रोकने का रहा है। डॉ. अंबेडकर से लेकर मान्यवर कांशीराम तक, बहुजन नायकों को अपना हक छीनने के लिए कांग्रेस से ही लड़ना पड़ा था। 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों से पहले, दलित समाज को यह तय करना होगा कि वह अपने वोट की ताकत का इस्तेमाल बहुजन मिशन को मजबूत करने के लिए करेगा या फिर उन पार्टियों की बैसाखी बनेगा जिन्होंने दशकों तक उनका सिर्फ इस्तेमाल किया है।
