
क्या आपने कभी गहराई से यह सोचा है कि जो समाज इस देश की 85% आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, वह आज भी सत्ता, संसाधनों और व्यवस्था के हाशिये पर क्यों खड़ा है? सदियों का शोषण सहने के बावजूद, SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदायों को मिलाकर बनने वाला 'बहुजन समाज' आख़िर एक मंच पर क्यों नहीं आ पाता? यह केवल एक राजनीतिक सवाल नहीं है, बल्कि भारत की आत्मा को झकझोरने वाला एक गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक यथार्थ है।
एक तरफ जहाँ मुट्ठी भर लोग संसाधनों पर एकाधिकार जमाए बैठे हैं, वहीं बहुजन समाज आपस में ही बंटा हुआ है। आइए, एक ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक नजरिए से इस कड़वे सच की पड़ताल करते हैं कि आख़िर क्यों बहुजन समाज एक नहीं हो पाता?
बहुजन समाज का अर्थ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
'बहुजन' का शाब्दिक अर्थ है - 'बहुत से लोग' या 'बहुसंख्यक'। भारतीय संदर्भ में इसमें अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और पसमांदा अल्पसंख्यक शामिल हैं। बहुजन राजनीति की नींव मुख्य रूप से महात्मा जोतीराव फुले, पेरियार ई.वी. रामासामी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर जैसे महापुरुषों ने रखी थी।
1873 में जोतीराव फुले द्वारा स्थापित 'सत्यशोधक समाज' का मुख्य उद्देश्य ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देना और बहुजनों को एकजुट करना था। इसके बाद डॉ. अंबेडकर ने 'शेड्यूल कास्ट फेडरेशन' और 'रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया' (RPI) के जरिए इस आंदोलन को राजनीतिक धार दी। दक्षिण भारत में भी जस्टिस पार्टी और पेरियार के 'आत्मसम्मान आंदोलन' ने द्रविड़ पहचान के आधार पर निचली जातियों को एकजुट करने का सफल प्रयास किया। लेकिन आज़ादी के बाद, यह ऐतिहासिक एकता धीरे-धीरे दरकने लगी।
बहुजन समाज के एक न होने के प्रमुख कारण
बहुजन समाज के विखंडन के पीछे किसी एक कारक को दोष नहीं दिया जा सकता। इसके पीछे गहरी ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक खाइयाँ हैं:
1. जातिगत विभाजन और 'श्रेणीबद्ध असमानता' (Caste Fragmentation)
डॉ. अंबेडकर ने हिंदू जाति व्यवस्था को 'श्रेणीबद्ध असमानता' (Graded Inequality) का नाम दिया था। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इसमें हर शोषित जाति अपने से नीचे एक और जाति को खोज लेती है और उसी में अपना गर्व महसूस करती है। बहुजन समाज केवल सवर्णों और अवर्णों में नहीं बंटा है, बल्कि यह खुद के भीतर भी हजारों उप-जातियों में विभाजित है। उदाहरण के लिए, तेलंगाना के दलितों में भी 'माला' और 'मदिगा' जातियों के बीच स्पष्ट पदानुक्रम और सामाजिक दूरी मौजूद है। इनमें आपस में रोटी-बेटी का व्यवहार तो दूर, कई बार साथ पानी पीने तक की मनाही देखी जाती है। जब एक शोषित वर्ग दूसरे शोषित वर्ग के साथ ही भेदभाव करेगा, तो एकता कैसे संभव है?
2. ऐतिहासिक सामाजिक व्यवस्था और 'संस्कृतिकरण' (Sanskritization)
इतिहासकार और समाजशास्त्री मानते हैं कि बहुजन समाज का एक बड़ा हिस्सा 'संस्कृतिकरण' (Sanskritization) का शिकार हो गया। इसका अर्थ है कि निचली जातियां ब्राह्मणवादी व्यवस्था को तोड़ने के बजाय, खुद सवर्णों की नकल करके उच्च सामाजिक दर्जा पाने की कोशिश करने लगीं। उत्तर भारत में यादवों का खुद को 'आर्य' और क्षत्रिय वंशज साबित करने का प्रयास इसका एक बड़ा उदाहरण है। इस मानसिकता ने बहुजनों को एक स्वतंत्र और समतामूलक पहचान (जैसे दक्षिण भारत में द्रविड़ या बौद्ध पहचान) विकसित करने से रोक दिया।
3. वोट बैंक की राजनीति और सत्ता का स्वार्थ
आज़ादी के बाद, बहुजन राजनीति सिर्फ वोट बैंक और चुनाव जीतने तक सीमित रह गई। जब भी किसी बहुजन दल को सत्ता मिली, उसने पूरे बहुजन समाज का उद्धार करने के बजाय केवल अपनी विशिष्ट उप-जाति का ही भला किया। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (SP) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के गठबंधन की विफलता इसका ज्वलंत प्रमाण है। 2019 के चुनावों में गैर-जाटव दलितों और गैर-यादव पिछड़ी जातियों ने इस गठबंधन से खुद को अलग-थलग महसूस किया और उनका भारी वोट भाजपा की ओर खिसक गया। यह स्पष्ट करता है कि राजनीतिक दल बहुजनों को केवल 'वोट' मानते हैं, उनकी एकता के लिए कोई ज़मीनी काम नहीं करते।
4. नेतृत्व का बिखराव और 'अनैतिक परिवारवाद'
वर्तमान बहुजन नेतृत्व पूरी तरह से वैचारिक दिवालियेपन और 'अनैतिक परिवारवाद' (Amoral Familism) का शिकार है। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, मायावती जैसे नेताओं ने सत्ता को केवल अपने परिवार या एक छोटे से घेरे तक सीमित रखा। इन नेताओं ने अपने ही समाज के अन्य योग्य व्यक्तियों पर भरोसा नहीं किया, तो वे अन्य दलित-पिछड़ी जातियों का भरोसा कैसे जीतेंगे? इसके अतिरिक्त, बहुजनों के पास RSS जैसी कोई मजबूत 'पैरेंट संस्था' (Parent Organization) नहीं है जो राजनीतिक दलों पर नियंत्रण रख सके और समाज में वैचारिक काम कर सके (हालाँकि कांशीराम ने BAMCEF के रूप में यह प्रयास किया था, लेकिन वह भी बाद में पारदर्शी नहीं रहा)।
5. शिक्षा और जागरूकता की कमी
ऐतिहासिक रूप से शिक्षा से वंचित रखे जाने के कारण बहुजन समाज में आज भी आलोचनात्मक चेतना (Critical Consciousness) का अभाव है। जो थोड़े बहुत लोग शिक्षित हुए भी हैं, उन्होंने ब्राह्मणवादी शिक्षा प्रणाली से ही ज्ञान प्राप्त किया है, जिसके कारण उनके भीतर एक 'सच्चे समतामूलक' समाज की दृष्टि विकसित नहीं हो पाई। वे अक्सर 'व्यक्तिगत सफलता' को ही समाज की सफलता मान बैठते हैं।
6. आपसी अविश्वास
बहुजन समाज की विभिन्न जातियों के बीच गहरा अविश्वास है। रोहिणी आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, OBC आरक्षण का 97% लाभ केवल 25% प्रभावी जातियों ने उठाया है, जबकि 983 (लगभग 37%) पिछड़ी जातियों को नौकरियों या शिक्षा में शून्य प्रतिनिधित्व मिला है। इसी तरह दलितों में भी कुछ जातियों ने संसाधनों पर एकाधिकार कर लिया है। जब अति-पिछड़ा वर्ग (EBC) और महादलित यह देखते हैं कि उनके ही समाज की दबंग जातियां उनका हक मार रही हैं, तो उनके बीच गहरी खाई पैदा हो जाती है।
7. आर्थिक असमानता और संसाधनों की कमी (Economic Inequality)
- गरीबी और सीमित संसाधन: बिहार के हालिया जातिगत सर्वेक्षण के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि राज्य में सवर्णों की आबादी मात्र 15.5% है, लेकिन 75% सरकारी नौकरियों पर उनका कब्जा है। वहीं, 36% आबादी वाले अत्यंत पिछड़े वर्ग (EBC) की सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी 1% से भी कम है।
- रोजगार और शिक्षा की कमी: संसाधनों के अभाव में बहुजन समाज का एक बड़ा हिस्सा दिहाड़ी मज़दूरी और संघर्ष में अपना जीवन खपा देता है। उनके पास राजनीति या वैचारिक विमर्श के लिए समय और पैसा ही नहीं बचता।
- आर्थिक प्रतिस्पर्धा के कारण दूरी: जब संसाधन सीमित होते हैं, तो हर छोटी जाति अपने हक़ के लिए दूसरी शोषित जाति से ही लड़ने लगती है। आरक्षण के छोटे से कोटे के भीतर मची यह गलाकाट प्रतिस्पर्धा जातियों को एकजुट होने के बजाय एक-दूसरे का दुश्मन बना देती है।
बहुजन एकता क्यों ज़रूरी है?
लोकतंत्र में संख्या बल ही सबसे बड़ी ताक़त है। जब तक 85% बहुजन समाज एकजुट नहीं होगा, तब तक देश की संस्थाओं (न्यायपालिका, मीडिया, उच्च शिक्षा और ब्यूरोक्रेसी) में उच्च जातियों का Elite Monopoly बना रहेगा। बिना बहुजन एकता के, जो नीतियां बनेंगी वे हवा-हवाई होंगी और उनका लाभ ज़मीन पर खड़े अंतिम व्यक्ति (जैसे विमुक्त और घुमंतू जनजातियाँ - DNTs) तक कभी नहीं पहुंचेगा। बहुजन एकता केवल सत्ता पाने के लिए नहीं, बल्कि भारत को एक वास्तविक समतामूलक और न्यायपूर्ण राष्ट्र बनाने के लिए अनिवार्य है।
निष्कर्ष
बहुजन समाज का एक न हो पाना केवल उनकी विफलता नहीं है, बल्कि यह उस हज़ारों साल पुरानी मनुवादी और श्रेणीबद्ध व्यवस्था की "सफलता" है, जिसे बहुत ही चालाकी से हमारे दिमागों में बैठाया गया है। आज़ादी के इतने दशकों बाद भी अगर बहुजन समाज आपस में लड़ रहा है, तो यह समय आत्म-मंथन का है।
बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि "जाति के आधार पर कुछ भी खड़ा नहीं किया जा सकता।"। बहुजनों को यह समझना होगा कि उनका असली दुश्मन उनका पड़ोसी दलित या पिछड़ा नहीं है, बल्कि वह व्यवस्था है जो दोनों को गुलाम बनाए रखना चाहती है। जब 'अनैतिक परिवारवाद' और 'उप-जातियों के अहंकार' को पीछे छोड़कर बहुजन समाज "स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व" (Liberty, Equality, Fraternity) के मूल्यों पर एक साथ खड़ा होगा, तभी एक नए और न्यायपूर्ण भारत का उदय संभव है। यह सफर कठिन ज़रूर है, लेकिन असंभव बिल्कुल नहीं।
FAQ Section (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
बहुजन समाज में कौन-कौन से वर्ग आते हैं?
बहुजन समाज में मुख्य रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), विमुक्त जनजातियाँ (DNTs) और पसमांदा अल्पसंख्यक समुदाय शामिल होते हैं।
बहुजन राजनीति का पतन क्यों हुआ?
बहुजन राजनीति के पतन के मुख्य कारण अवसरवादी नेतृत्व, अनैतिक परिवारवाद, उप-जातियों के बीच सत्ता का असंतुलन, संसाधनों की कमी और वैचारिक दिशा का भटकाव रहा है।
श्रेणीबद्ध असमानता (Graded Inequality) क्या है?
यह डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा दी गई एक अवधारणा है, जिसका अर्थ है एक ऐसी सीढ़ीनुमा व्यवस्था जहाँ हर जाति अपने से नीचे एक और जाति को रखकर खुद को श्रेष्ठ मानती है। यह व्यवस्था जातियों को कभी एकजुट नहीं होने देती।
