
इतिहास के पन्नों में कुछ पल ऐसे दर्ज होते हैं जो किसी पूरे समाज की दिशा और दशा को हमेशा के लिए बदल देते हैं। भारत में सदियों से हाशिए पर रहे दलित और बहुजन समाज का संघर्ष भी एक ऐसे ही ऐतिहासिक मोड़ पर तब पहुँचा, जब उनकी आवाज देश की सरहदों को पार कर वैश्विक मंच पर गूँज उठी। यह एक ऐसा समय था जब भारतीय उपमहाद्वीप में चल रहा बहुजन आंदोलन केवल एक राष्ट्रीय मुद्दा नहीं रह गया था, बल्कि इसने एक अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप ले लिया था।
इस कड़ी में World Dalit Convention 1998 एक मील का पत्थर साबित हुआ,। यह केवल एक सम्मेलन नहीं था, बल्कि दुनिया भर में फैले शोषित और वंचित वर्गों के लिए सम्मान और अधिकारों की एक वैश्विक हुंकार थी। भारत में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक और महान समाज सुधारक मान्यवर कांशीराम (Kanshi Ram) ने इस मंच से जो ओजस्वी और ऐतिहासिक भाषण दिया, उसने न सिर्फ दलितों के भीतर एक नई राजनीतिक चेतना का संचार किया, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान भी जाति आधारित भेदभाव की ओर खींचा। उनकी Kuala Lumpur की Specch में दिया गया संबोधन आज भी बहुजन राजनीति के सबसे प्रभावशाली और दूरदर्शी वक्तव्यों में गिना जाता है। इस लेख में हम इसी सम्मेलन की गहराई, मान्यवर कांशीराम के विचारों और इसके ऐतिहासिक महत्व का गहन विश्लेषण करेंगे।
First World Dalit Convention 1998 क्या था
First World Dalit Convention (प्रथम विश्व दलित सम्मेलन) 10 और 11 अक्टूबर 1998 को मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर (Kuala Lumpur) के माइंस रिज़ॉर्ट सिटी में आयोजित किया गया था,। इस महासम्मेलन का मुख्य विषय (Theme) 'जातिविहीन समाज की दिशा में एक नया दृष्टिकोण' (A new vision towards a casteless society) रखा गया था।
यह आयोजन मुख्य रूप से 'दलित इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन' (Dalit International Organisation - DIO) द्वारा किया गया था और इसे मलेशिया के 'इंडियन प्रोग्रेसिव फ्रंट' (Indian Progressive Front) द्वारा प्रायोजित किया गया था, जिसके अध्यक्ष एम.जी. पंडितन (M.G. Pandithan) थे।
इस Dalit international conference 1998 में दुनिया भर से 700 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था,। इनमें प्रसिद्ध राजनेता, दलित आंदोलनों के प्रख्यात नेता, समाज सुधारक, अर्थशास्त्री, शिक्षाविद और मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल थे। भारत से भी कई बड़े नेताओं ने इसमें शिरकत की, जिनमें मान्यवर कांशीराम मुख्य अतिथि थे और दलित सेना के अध्यक्ष राम विलास पासवान भी इस आयोजन का प्रमुख हिस्सा थे,। इस सम्मेलन की महत्ता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति के.आर. नारायणन (K.R. Narayanan) ने भी इस सम्मेलन के लिए अपना विशेष संदेश भेजा था, जिसमें उन्होंने बुद्ध, फुले और डॉ. अंबेडकर के समतामूलक समाज के सपने को याद किया था।
Kanshi Ram का Kuala Lumpur भाषण
इस सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए मान्यवर कांशीराम ने एक अत्यंत ही बेबाक, तार्किक और भविष्योन्मुखी भाषण दिया था,। उनके इस भाषण ने वहां मौजूद 700 से अधिक विदेशी और देशी प्रतिनिधियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कांशीराम जी का संदेश स्पष्ट था - "वे अब याचना करने के पक्ष में नहीं थे, बल्कि शासन करने की बात कर रहे थे।"
उनके भाषण के कुछ प्रमुख और क्रांतिकारी विचार इस प्रकार थे:
1. "Dalits Should Become Rulers Instead of Being Ruled" (दलितों को शासित होने के बजाय शासक बनना चाहिए):
कांशीराम जी ने इस सम्मेलन में सबसे बड़ा मंत्र दिया कि दलितों को अब हमेशा मांगने वाला (Takers) नहीं, बल्कि देने वाला (Givers) बनना चाहिए। उन्होंने कहा, "हमने बहुत लंबे समय तक दूसरों का शासन सहा है। अब समय आ गया है कि हम अपनी नियति बदलें और शासक बनें।" उनका स्पष्ट मानना था कि जब तक हम शासक नहीं बनते, हमारी समस्याएं कभी खत्म नहीं होंगी। उन्होंने कहा कि आरक्षण हमारी समस्याओं का अंतिम समाधान नहीं है; हमें अपने लोगों को आरक्षण मांगने वाला नहीं, बल्कि आरक्षण 'देने वाला' बनाना होगा, और आरक्षण केवल एक शासक ही दे सकता है।
2. जाति का 'दोधारी तलवार' के रूप में उपयोग:
उन्होंने जाति व्यवस्था की कड़वी सच्चाई को स्वीकारते हुए कहा कि मनुवादी जातियां (Manuvadis) कभी भी जाति व्यवस्था को खत्म नहीं करना चाहेंगी क्योंकि इसी व्यवस्था से उन्हें सदियों से फायदा मिल रहा है,। उन्होंने कहा कि "जब तक जाति जीवित है, मैं अपने समाज के हित में इसका इस्तेमाल करता रहूंगा।" कांशीराम जी ने जाति को एक 'दोधारी तलवार' बताया, जिसका इस्तेमाल अगर सही तरीके से किया जाए तो यह उसी व्यवस्था को काट सकती है जिसने दलितों का शोषण किया है।
3. 10 करोड़ "भारतीय शरणार्थियों" (Indian Refugees) का मुद्दा:
उनके भाषण का एक बेहद मार्मिक और झकझोरने वाला हिस्सा वह था जब उन्होंने शहरों की मलिन बस्तियों में रहने वाले 10 करोड़ दलितों और वंचितों का जिक्र किया,। उन्होंने कहा कि गांव में सवर्ण जमींदारों के शोषण और अत्याचार से तंग आकर ये लोग शहर आ जाते हैं, लेकिन यहां भी वे सीवर और रेलवे ट्रैक के किनारे नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं,। कांशीराम जी ने इन्हें 'इंडियन रिफ्यूजी' (भारतीय शरणार्थी) कहा और सरकार की इस बात पर आलोचना की कि देश के बाहर से आए शरणार्थियों के लिए तो बजट है, लेकिन इन 10 करोड़ स्वदेशी शरणार्थियों के लिए कोई बजट नहीं है। उन्होंने व्यंग्य कसते हुए कहा कि भारतीय लोग अपनी जमीन, अपनी झोपड़ी सब पीछे छोड़ सकते हैं, लेकिन अपनी 'जाति' कभी पीछे नहीं छोड़ते; वे जहां जाते हैं, इसे अपने साथ ले जाते हैं।
4. 'पॉलिटिकल मास्टर की' (Political Master Key):
बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि राजनीतिक सत्ता वह 'मास्टर की' (Master Key) है जिससे विकास और सम्मान के सभी दरवाजे खोले जा सकते हैं,। उन्होंने कहा कि अन्य सभी वाद (जैसे समाजवाद या मार्क्सवाद) भारत में इसलिए विफल हैं क्योंकि वे 'जाति' की सच्चाई को स्वीकार नहीं करते।
इस सम्मेलन के मुख्य प्रस्ताव (Resolutions)
First World Dalit Convention केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें बहुजन समाज की मुक्ति और अधिकारों के लिए कई महत्वपूर्ण और कड़े प्रस्ताव (Resolutions) भी पारित किए गए। इन प्रस्तावों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भारत और अन्य देशों में दलितों की स्थिति से अवगत कराया:
- मानवाधिकार और संयुक्त राष्ट्र का हस्तक्षेप: सम्मेलन ने सर्वसम्मति से संयुक्त राष्ट्र (UN) से आग्रह किया कि वह तुरंत "विशेष दूत" (Special Rapporteurs) नियुक्त करे, जो भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में दलितों पर हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों और जातिगत भेदभाव की जांच करे।
- रंगभेद (Apartheid) से भी बदतर स्थिति: इस सम्मेलन ने दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा कि भारत और दुनिया भर में 30 करोड़ (300 million) दलित जिस नियति का सामना कर रहे हैं, वह दक्षिण अफ्रीकी या अमेरिकी रंगभेद (Apartheid) से भी कहीं अधिक बदतर है।
- सरकार से कड़े कदम उठाने की मांग: सम्मेलन में भारत की केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की गई कि वे निर्दोष दलित महिलाओं और बच्चों पर हो रहे अत्याचारों और बंधुआ मजदूरी को तुरंत रोकें।
- आरक्षण को पूरी तरह लागू करना: पुलिस, सशस्त्र बलों और न्यायपालिका सहित सभी स्तरों पर SC/ST के लिए आरक्षण को सख्ती से लागू करने और सभी रिक्त पदों को तुरंत भरने का प्रस्ताव पारित किया गया। साथ ही, SC/ST कल्याण आयोग को न्यायिक और दंडात्मक शक्तियां देने की मांग की गई।
इस सम्मेलन का वैश्विक प्रभाव
इस Dalit international conference 1998 ने Dalit movement international (अंतरराष्ट्रीय दलित आंदोलन) की नींव रखने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई।
- जाति का अंतर्राष्ट्रीयकरण: इस सम्मेलन के कारण जाति-आधारित भेदभाव जो अब तक केवल भारत का आंतरिक मामला माना जाता था, वह एक वैश्विक मानवाधिकार का मुद्दा बन गया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र (UN) और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर 'जाति' पर गंभीर चर्चाएं शुरू हो गईं।
- वैश्विक नेटवर्क का निर्माण: इस सम्मेलन ने दुनिया भर में फैले दलित प्रवासियों (Diaspora) को एकजुट किया। इसी की तर्ज पर आगे चलकर वर्ष 2000 में 'इंटरनेशनल दलित सॉलिडेरिटी नेटवर्क' (International Dalit Solidarity Network - IDSN) जैसी संस्थाओं का गठन हुआ, जिसने संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ (EU) में दलितों की आवाज़ को मजबूती से उठाया।
- डरबन सम्मेलन (WCAR 2001) का मार्ग प्रशस्त: कुआलालंपुर सम्मेलन से उठी इस लहर का ही परिणाम था कि 2001 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुए 'वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस अगेंस्ट रेसिज्म' (WCAR) में 200 से अधिक दलित प्रतिनिधियों ने पूरे दमखम से अपनी बात रखी और नारा दिया "Dalit Rights are Human Rights"।
बहुजन आंदोलन के इतिहास में इस भाषण का महत्व
Kuala Lumpur Dalit conference में मान्यवर कांशीराम का यह भाषण केवल एक बौद्धिक वक्तव्य नहीं था; यह बहुजन समाज के लिए एक 'एक्शन प्लान' था।
इस भाषण ने दलित नेतृत्व की सोच को 'मांगने वाले' (याचक) से 'शासन करने वाले' (शासक) में तब्दील कर दिया,। कांशीराम जी ने जब यह कहा कि डॉ. अंबेडकर का आंदोलन इसलिए कमजोर पड़ा क्योंकि वे अलग-थलग पड़ गए थे और हमें भारत की 6000 जातियों में बंटे समाज को 'बहुजन' के रूप में एकजुट करना होगा, तो यह एक रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक था,। उन्होंने स्पष्ट किया कि शासक बने बिना समतामूलक और जातिविहीन समाज का निर्माण कोरी कल्पना है।
उनके इस दृष्टिकोण (Global Dalit movement) ने भारत में बहुजन समाज पार्टी (BSP) को सिर्फ एक पार्टी नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन का हथियार बना दिया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच से यह घोषित कर दिया कि भारत का दलित अब दया का मोहताज नहीं है; वह सत्ता की चाबी छीनने के लिए तैयार है।
निष्कर्ष
वर्ष 1998 का World Dalit Convention और उसमें दिया गया मान्यवर कांशीराम का ऐतिहासिक भाषण, Dalit human rights movement के इतिहास का वह सुनहरा अध्याय है जिसने दलितों की लड़ाई को वैश्विक पटल पर ला खड़ा किया। कांशीराम जी की दूरदर्शिता, उनका "Dalits should become rulers" का नारा और जाति को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर उसी के विनाश का सिद्धांत, आज भी दुनिया भर में शोषित वर्गों के लिए एक प्रेरणा स्रोत है।
यह सम्मेलन इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि जब शोषितों की आवाज़ एकजुट होती है, तो वह सरहदों के पार जाकर दुनिया की सबसे बड़ी संस्थाओं को भी सोचने पर मजबूर कर देती है। कुआलालंपुर का वह मंच महज़ एक सम्मेलन नहीं था, बल्कि वह सदियों से दबे-कुचले समाज के राजनीतिक और सामाजिक पुनर्जागरण की उद्घोषणा थी, जिसकी गूंज आज भी बहुजन राजनीति में स्पष्ट रूप से सुनी जा सकती है।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
First World Dalit Convention 1998 कहाँ और कब आयोजित हुआ था?
यह सम्मेलन 10 और 11 अक्टूबर 1998 को मलेशिया के कुआलालंपुर (Kuala Lumpur) के माइंस रिज़ॉर्ट सिटी में आयोजित किया गया था।
First World Dalit Convention 1998 सम्मेलन के मुख्य अतिथि कौन थे?
इस ऐतिहासिक सम्मेलन के मुख्य अतिथि भारत में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक मान्यवर कांशीराम (Kanshi Ram) थे।
कांशीराम जी ने कुआलालंपुर भाषण में दलितों को क्या मूल संदेश दिया?
उन्होंने संदेश दिया कि दलितों को अब आरक्षण और अधिकार मांगने वाला (Takers) नहीं, बल्कि सत्ता हासिल कर शासक (Rulers) बनना चाहिए, जो दूसरों को अधिकार दे सके।
