
भारतीय राजनीति में जब भी दलित और बहुजन विमर्श की बात आती है, तो बहुजन समाज पार्टी (BSP) का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में लगातार कई चुनावों में मिली पराजय ने बसपा के शीर्ष नेतृत्व को आत्ममंथन करने पर मजबूर कर दिया है। आज के दौर की राजनीति विचारों से कहीं अधिक 'धनबल' (Money Power) और मजबूत संगठनात्मक ढांचे पर निर्भर हो चुकी है। इसी जमीनी हकीकत को स्वीकार करते हुए, बसपा ने अब महाराष्ट्र और खासकर विदर्भ क्षेत्र में अपनी जड़ों को फिर से सींचने के लिए एक बेहद आक्रामक और पुरानी लेकिन कारगर "बसपा की नई रणनीति" तैयार की है। पार्टी अब अपने संस्थापक कांशीराम के उसी मूल मंत्र की ओर लौट रही है, जिसने कभी देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था।
घटना / खबर क्या है
हाल ही में रविवार को महाराष्ट्र के वर्धा जिले में बहुजन समाज पार्टी का एक महत्वपूर्ण 'विदर्भ स्तरीय सम्मेलन' आयोजित किया गया। यह सम्मेलन कोई साधारण बैठक नहीं थी, बल्कि इसे पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम की जयंती के विशेष अवसर पर आयोजित किया गया था।
इस विशाल सम्मेलन में बसपा के प्रदेश प्रभारी और राज्यसभा सांसद रामजी गौतम तथा प्रदेश अध्यक्ष सुनील डोंगरे ने प्रमुख रूप से शिरकत की। विदर्भ के अलग-अलग जिलों से हजारों कार्यकर्ता बसों और अन्य वाहनों के जरिए इस कार्यक्रम में पहुंचे थे, जिनमें नागपुर से नागोराव जयकर, पृथ्वीराज शेंडे और उत्तम शेवडे जैसे प्रमुख पदाधिकारी शामिल थे। इस बैठक में एक सूत्रीय एजेंडा तय किया गया— संगठन को नए सिरे से विस्तार देना और कमेटियों का पुनर्गठन करना। जल्द ही पार्टी की शहर कार्यकारिणी, युवा कार्यकारिणी और महिला कार्यकारिणी का बड़े पैमाने पर विस्तार किया जाएगा।
इस फैसले या घटना का उद्देश्य
बसपा के इस नए कदम का सबसे बड़ा और सीधा उद्देश्य आधुनिक राजनीति में भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के 'धनबल' का मुकाबला करना है। पार्टी आलाकमान यह मान चुका है कि वर्तमान राजनीति में चुनाव जीतने के लिए केवल विचारधारा काफी नहीं है, बल्कि संसाधनों की भी उतनी ही आवश्यकता है।
इसलिए, बसपा की नई रणनीति के तहत संगठन की विभिन्न समितियों का विस्तार कर कार्यकर्ताओं को सीधा लक्ष्य दिया जाएगा कि वे पार्टी फंड में अपना बड़ा आर्थिक योगदान दें। इतना ही नहीं, कार्यकर्ताओं को यह भी जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे समाज के अन्य 'बहुजनवादियों' से संपर्क करें और उनसे भी पार्टी के लिए धन का सहयोग मांगें। कैडर को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए आवश्यक होने पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों को भी नई गति दी जाएगी ताकि वे बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में बहुजन विचार की राजनीति के महत्व को समझ सकें।
इससे समाज या राजनीति पर प्रभाव
इस रणनीतिक बदलाव का सबसे गहरा असर महाराष्ट्र और राष्ट्रीय स्तर के विपक्षी गठबंधनों (विशेषकर कांग्रेस और बसपा के रिश्तों) पर पड़ेगा। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा ने खुद को एक प्रखर हिंदुवादी संगठन के रूप में स्थापित किया है और उस पर समाज के समृद्ध वर्ग का प्रतिनिधित्व करने का आरोप लगता है। ऐसे में कई बार वैचारिक स्तर पर बसपा को कांग्रेस के करीब मान लिया जाता है, लेकिन पार्टी अब इस धारणा को पूरी तरह तोड़ना चाहती है।
बसपा अब समाज में एक नया विमर्श खड़ा कर रही है। नेताओं ने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे जनता के बीच जाएं और पार्टी को कांग्रेस से बिल्कुल अलग साबित करें। बसपा का तर्क है कि कांग्रेस ने हमेशा डॉ. बाबासाहब आंबेडकर और कांशीराम का विरोध किया, लेकिन आज वोट बैंक के लिए कांग्रेस कार्यकर्ता इन्हीं महापुरुषों की तस्वीरें लेकर घूमते हैं। समाज में फैले इस 'भ्रम' को दूर करने के लिए बसपा अब एक सघन जन-जागरण अभियान चलाएगी। इससे दलित और बहुजन वोटरों के बीच कांग्रेस की पैठ कमजोर हो सकती है और वे वापस बसपा की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
विशेषज्ञ या नेताओं की प्रतिक्रिया
इस सम्मेलन में बसपा नेताओं के तेवर काफी तीखे रहे, खासकर कांग्रेस को लेकर। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुनील डोंगरे ने तो राजनीतिक शिष्टाचार की रेखाएं खींचते हुए सीधे तौर पर कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी पर निशाना साधा।
सुनील डोंगरे ने उस भाजपाई नैरेटिव का खुला समर्थन किया जिसमें राहुल गांधी को 'पप्पू' कहा जाता है। डोंगरे ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि "राहुल गांधी की बातें कई बार अबोध बच्चों के समान रहती हैं"। यह बयान स्पष्ट करता है कि बसपा किसी भी सूरत में कांग्रेस के साथ वैचारिक या राजनीतिक नरमी बरतने के मूड में नहीं है और वह बहुजन समाज को यह साफ संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस उनका सच्चा हितैषी नहीं हो सकती।
निष्कर्ष
बहुजन समाज पार्टी का यह कदम स्पष्ट करता है कि वह हार मानकर बैठने वालों में से नहीं है। 'बसपा की नई रणनीति' केवल फंड इकट्ठा करने की योजना नहीं है, बल्कि यह कैडर को रिचार्ज करने, कांग्रेस के 'दलित प्रेम' की काट खोजने और अपने मूल वोट बैंक को वापस घर लाने की एक व्यापक रूपरेखा है। 'नोट भी और वोट भी' का जो पैटर्न 30-40 साल पहले सफल हुआ था, क्या वह आज के सोशल मीडिया और ध्रुवीकरण के युग में भी उतना ही कारगर साबित होगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन एक बात तय है कि विदर्भ और महाराष्ट्र की राजनीति में बसपा अब एक मूक दर्शक बनकर नहीं, बल्कि एक आक्रामक खिलाड़ी बनकर मैदान में उतरने को तैयार है।
