
लाहौर की वह एक सर्द और खामोश शाम थी। हवाओं में एक अजीब सी उदासी घुली हुई थी और सेंट्रल जेल के बाहर का सन्नाटा किसी बड़े तूफान के आने का इशारा कर रहा था। यह कोई आम शाम नहीं थी; यह वह शाम थी जब भारत मां के तीन सच्चे सपूतों ने हंसते-हंसते मौत को गले लगाने का फैसला किया था। Shaheed Diwas 23 March इतिहास के पन्नों में एक ऐसा दिन है, जो हर भारतीय की आंखों में आज भी आंसू और सीने में गर्व भर देता है।
हम अक्सर Bhagat Singh के बारे में पढ़ते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि फांसी से ठीक पहले वाली रात और उन आखिरी पलों में क्या हुआ था? मौत सामने खड़ी थी, लेकिन उस नौजवान के चेहरे पर खौफ की एक लकीर तक नहीं थी।
आइए, कहानी के पन्नों को पलटते हैं और महसूस करते हैं Bhagat Singh की आखिरी रात को, जिसने पूरे ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला कर रख दी थी।
23 मार्च 1931 का दिन – क्या हुआ था?
22 मार्च की रात लाहौर में एक भयंकर धूल भरी आंधी आई थी। जब 23 मार्च की सुबह हुई, तो आंधी शांत हो चुकी थी, लेकिन जेल के भीतर हलचल तेज थी। अधिकारियों के बीच फुसफुसाहट चल रही थी। दरअसल, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी देने का समय 24 मार्च की सुबह तय किया गया था।
लेकिन देश भर में उबलते गुस्से और जेल के बाहर उमड़ती भीड़ को देखकर ब्रिटिश सरकार घबरा गई थी। पंजाब सरकार ने सुबह 10 बजे भगत सिंह को उनके वकील प्राण नाथ मेहता से आखिरी बार मिलने की अनुमति दी। मेहता जी से मुलाकात के तुरंत बाद, आईजी चार्ल्स स्टीड, एफ.ए. बार्कर और डिप्टी कमिश्नर लेन रॉबर्ट्स जैसे ब्रिटिश अधिकारियों की एक टीम भगत सिंह के पास पहुंची। उन्होंने भगत सिंह को ब्रिटिश सरकार से माफी मांगने की बिन-मांगी सलाह दी, जिसे इस वीर बलिदानी ने तिरस्कार के साथ ठुकरा दिया।
उसी दिन दोपहर में जेल वार्डन चतर सिंह ने इन तीनों क्रांतिकारियों को सूचना दी कि उनकी फांसी का समय बदल दिया गया है, और उन्हें 23 मार्च की शाम को ही फांसी दे दी जाएगी।
Bhagat Singh की आखिरी रात का पूरा सच
यह कल्पना करना भी रोंगटे खड़े कर देता है कि जिस इंसान को पता हो कि उसकी जिंदगी के सिर्फ कुछ घंटे बचे हैं, वह क्या सोच रहा होगा।
जेल में आखिरी घंटे कैसे बीते?
फांसी की खबर सुनकर जहां एक आम इंसान टूट जाता है, वहीं Bhagat Singh शांत और अडिग थे। वार्डन चतर सिंह जो खुद इस घटना से बहुत दुखी थे, उन्होंने भगत सिंह से भावुक होकर कहा कि आखिरी वक्त है, अब वाहेगुरु का नाम ले लो। लेकिन भगत सिंह ने विनम्रता से इनकार कर दिया।
जेल में रहने के दौरान भगत सिंह ने बेबे नाम के एक मुस्लिम सफाई कर्मचारी से फांसी से एक दिन पहले शाम को घर का बना खाना लाने का अनुरोध किया था। बेबे ने सहर्ष यह बात मान ली थी और वादा किया था। लेकिन जेल के बाहर सुरक्षा इतनी कड़ी कर दी गई थी कि बेबे उस शाम जेल के अंदर प्रवेश ही नहीं कर सका, और भगत सिंह की यह छोटी सी आखिरी इच्छा अधूरी रह गई।
फांसी से पहले Bhagat Singh क्या कर रहे थे?
मौत के साये में भी इस महान क्रांतिकारी की पढ़ने की भूख शांत नहीं हुई थी। फांसी के तख्ते पर जाने से ठीक पहले भगत सिंह रूसी क्रांतिकारी व्लादिमीर लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। वकील प्राण नाथ मेहता ही उनके लिए यह किताब लेकर आए थे।
जब अधिकारियों ने उन्हें बताया कि फांसी का वक्त हो गया है, तो भगत सिंह ने किताब से नजरें हटाए बिना कहा कि रुकिए, "एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।" उन्होंने किताब के कुछ पन्ने और पढ़े और फिर किताब को उछालकर शान से बोले, "ठीक है, अब चलिए।"
Rajguru और Sukhdev के साथ आखिरी बातचीत
जब भगत सिंह, Rajguru और Sukhdev को उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया, तो उन्होंने पूरे जोश के साथ "इंकलाब जिंदाबाद" के नारे लगाए। उनकी यह भारी और ओजस्वी आवाज सुनकर जेल के बाकी कैदियों ने भी उनके साथ नारे लगाने शुरू कर दिए। लाहौर जिला कांग्रेस के सचिव पिंडी दास सोढ़ी का घर जेल के पास ही था, जहां तक ये नारे साफ सुनाई दे रहे थे।
जब ये तीनों युवा फांसी के तख्ते के पास पहुंचे, तो उन्होंने अपने चेहरे और गर्दन पर काला कपड़ा (मास्क) पहनने से साफ इनकार कर दिया। भगत सिंह ने तो वह मास्क जिला मजिस्ट्रेट की तरफ फेंक दिया था। फांसी के फंदे को चूमने से पहले भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने आखिरी बार एक-दूसरे को गले लगाया और "ब्रिटिश साम्राज्य मुर्दाबाद" के नारे लगाए।
क्या Bhagat Singh को डर लगा था?
बिल्कुल नहीं! भगत सिंह, Rajguru और Sukhdev की आंखों में खौफ का कोई नामोनिशान नहीं था।
लाहौर के डिप्टी कमिश्नर ए.ए. लेन रॉबर्ट्स एक बातूनी अधिकारी थे। जब तीनों क्रांतिकारी फांसी स्थल पर पहुंचे, तो रॉबर्ट्स ने भगत सिंह से बात की। भगत सिंह ने पूरे आत्मविश्वास के साथ उनकी आंखों में आंखें डालकर कहा कि "लोग बहुत जल्द देखेंगे और याद रखेंगे कि भारतीय स्वतंत्रता सेनानी किस बहादुरी से मौत को चूमते हैं।"।
इससे पहले उन्होंने पंजाब के गवर्नर को एक आखिरी खत लिखा था। उस खत में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि: "चूंकि हमारे खिलाफ यह आरोप लगाया गया है कि हमने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ा है, इसलिए हम युद्धबंदी (War Prisoners) हैं। और इसी आधार पर हमारी मांग है कि हमें फांसी पर लटकाने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाए।"।
फांसी से पहले उन्होंने अपने छोटे भाई कुलतार को लिखे एक भावुक खत में भी अपने निडर इरादों का परिचय दिया था। उन्होंने लिखा: "प्रिय कुलतार, मेरे बाद तुम्हें हमारे माता-पिता और परिवार की देखभाल करनी होगी। हमें भारत माता को अंग्रेजों से मुक्त कराने की लड़ाई जारी रखनी होगी। आज मैंने तुम्हारी आंखों में आंसू देखे, फांसी के बाद मजबूत बने रहना।"।
अंग्रेज सरकार ने फांसी जल्दी क्यों दी?
अंग्रेज सरकार की इस जल्दबाजी और कायरता के पीछे कई कारण थे:
- विद्रोह का डर: जेल के बाहर और पूरे देश में भारी भीड़ जमा हो रही थी। प्रशासन को डर था कि अगर 24 मार्च की सुबह फांसी दी गई, तो भीड़ बेकाबू होकर जेल पर हमला कर सकती है।
- गुप्त दाह-संस्कार की साजिश: नियमों को ताक पर रखकर 23 मार्च की शाम 7:33 बजे उन्हें फांसी दी गई। फांसी के बाद जेल के पिछले दरवाजे से शवों को ट्रकों में लादकर गुप्त रूप से निकाला गया।
- शवों का अपमान: पुलिस पार्टी शवों को गंडा सिंह वाला गांव के बाहर सतलुज नदी के किनारे ले गई। वहां मिटटी का तेल (Kerosene) छिड़क कर रात के अंधेरे में एक ही चिता पर तीनों का दाह-संस्कार करने की कोशिश की गई। जब भीड़ वहां पहुंचने लगी तो अंग्रेज शवों को अधजली हालत में नदी में फेंक कर भाग गए।
बाद में लोगों ने उन अधजले शवों के हिस्सों को नदी से निकाला और पूरे सम्मान के साथ रावी नदी के तट पर उनका अंतिम संस्कार किया, जहां लाला लाजपत राय का अंतिम संस्कार हुआ था।
देश पर इसका क्या असर पड़ा?
जैसे ही यह खबर फैली कि भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी गई है, पूरा देश शोक और भयंकर गुस्से में डूब गया।
- देश भर में जुलूस निकाले गए। लोग भूख हड़ताल पर चले गए और अपना दुख व्यक्त करने के लिए काले बिल्ले पहनकर व्यवसाय बंद कर दिए।
- कराची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन में मातम छा गया। सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में निकलने वाला जुलूस रद्द कर दिया गया।
- जवाहरलाल नेहरू ने कहा, "भगत सिंह एक साफ दिल के योद्धा थे... वह एक ऐसी चिंगारी थे जो बहुत कम समय में एक बड़ी ज्वाला बन गई और जिसने देश के एक कोने से दूसरे कोने तक फैलकर अंधेरे को रोशन कर दिया।"।
इस शहादत ने देश के युवाओं के अंदर इंकलाब की ऐसी आग भड़काई जिसने अंततः 1947 में अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
आज भी क्यों याद की जाती है यह रात?
23 मार्च की वह रात सिर्फ एक तारीख नहीं है, वह इस बात का प्रतीक है कि जब देशप्रेम की भावना मौत के खौफ से बड़ी हो जाती है, तो इतिहास रचा जाता है। भगत सिंह ने अपने विचारों से युवाओं को जो दिशा दी, वह आज भी प्रासंगिक है।
"जिंदगी तो अपने दम पर ही जी जाती है, दूसरों के कंधों पर तो सिर्फ जनाजे उठाए जाते हैं।"
"क्रांति मानव जाति का एक अपरिहार्य अधिकार है। स्वतंत्रता सभी का एक जन्मसिद्ध अधिकार है।"
"वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन वे मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन वे मेरी आत्मा को नहीं कुचल पाएंगे।"
Conclusion
Bhagat Singh की History हमें सिखाती है कि उम्र की लंबाई नहीं, बल्कि आपके कर्मों की गहराई मायने रखती है। 23 साल के एक नौजवान ने अपनी जान देकर करोड़ों मरे हुए जमीर वाले भारतीयों को जिंदा कर दिया। जब भी Shaheed Diwas 23 March आता है, हमें उस रात की वह खामोशी और इंकलाब जिंदाबाद की वह गूंज याद आनी चाहिए।
आज हम जिस आजाद हवा में सांस ले रहे हैं, उसकी कीमत उन तीन नौजवानों ने 23 मार्च 1931 की शाम अपने खून से चुकाई थी।
