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बुद्धवार सुबह 25 फरवरी 2026 को जब लखनऊ के गोमती नगर में बसपा विधायक उमाशंकर सिंह के आवास पर आयकर विभाग की टीमें पहुंचीं, तो न सिर्फ विपक्ष बल्कि सत्ता पक्ष के अंदर भी हलचल मच गई। 55 साल के इस तीन बार के विधायक पिछले दो साल से कैंसर जैसी बीमारी से जूझ रहे हैं। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी ने उन्हें क्वारंटाइन में डाल रखा है। डॉक्टर-नर्स तक को अंदर जाने नहीं दिया जा रहा। फिर भी छापा पड़ा।
लेकिन सबसे बड़ा ट्विस्ट यह कि योगी सरकार के उद्यान मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने खुलकर इसका विरोध किया। और वजह? उमाशंकर सिंह उनके सगे समधी हैं। उनकी बेटी कनिका सिंह का विवाह उमाशंकर सिंह के बेटे प्रिंस युवकेश सिंह से 2024 में हुआ था।
ऐसा लगता है, यह घटना सिर्फ एक छापेमारी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सियासत में इंसानियत, परिवार और सत्ता के बीच चल रहे जंग का नया अध्याय है।
क्या हुआ ठीक-ठीक? छापेमारी की पूरी टाइमलाइन
25 फरवरी सुबह करीब 7 बजे लखनऊ के गोमती नगर स्थित आवास पर 30 से ज्यादा IT अधिकारी भारी पुलिस बल के साथ पहुंचे। उसी समय बलिया के रसड़ा क्षेत्र के खानवार गांव में भी उनके दूसरे घर और संबंधित स्थानों पर छापा पड़ा। शाम तक कार्रवाई जारी रही। पुलिस ने पूरे इलाके को घेर लिया। आवाजाही बंद। विधायक घर में क्वारंटाइन में थे। कोई नर्स या डॉक्टर भी अंदर नहीं जा सका।
बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने तुरंत X पर पोस्ट किया – “बी.एस.पी. के विधायक श्री उमाशंकर सिंह जबसे बी.एस.पी. में आये हैं उन्होंने पूरी ईमानदारी व निष्ठा से अपनी ज़िम्मेवारी निभाई है और आजतक इनके क्षेत्र से इनके बारे में किसी भी प्रकार की अवैध तरीके़ से सम्पत्ति अर्जित करने या अन्य कोई भी ग़लत कार्य करने की शिकायत नहीं आई है। बीमारी में यह कार्रवाई दुर्भाग्यपूर्ण है।”
समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने उन्नाव में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा – “CM जापान गए हैं, इसलिए छापा पड़ा। वरना पुलिस लीक कर देती। बीजेपी को खुश रखो, छापा नहीं पड़ता।”
उमाशंकर सिंह कौन हैं? BSP की आखिरी किलेबंदी
उमाशंकर सिंह बलिया के रसड़ा से तीन बार (2012, 2017, 2022) विधायक चुने गए। 2011 में उन्होंने बीएसपी जॉइन की। पहले निर्माण व्यवसाय से जुड़े थे। 12वीं पास, लेकिन राजनीति में मजबूत पकड़।
2007 में मायावती की सरकार बनने के समय बीएसपी 206 सीटों पर थी। 2022 में सिर्फ एक सीट बची – रसड़ा। उमाशंकर सिंह उसी एक सीट के प्रतीक बन गए। मायावती ने उन्हें विधायक दल का नेता भी बनाया।
आज वे गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। अमेरिका से इलाज करा कर लौटे, फिर भी हालत नाजुक। सारे कारोबार बंद। सारा समय और पैसा दवा पर खर्च हो रहा है। परिवार कहता है – “अब कमाने का सवाल ही नहीं, जिंदा रहने का है।”
दिनेश प्रताप सिंह का भावुक पोस्ट – “प्रभु सद्बुद्धि दें”
मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने X पर जो लिखा:
“आज आयकर विभाग बलिया जिले के रसड़ा से विधायक उमाशंकर सिंह के घर पर छापेमारी कर रहा है, जिनके परिवार में हमारी रिश्तेदारी है। राज्य और देश के नेताओं के साथ-साथ आयकर विभाग को पता है कि विधायक पिछले दो वर्षों से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। दो साल से अधिक समय से वह जीवन और मौत के बीच जूझ रहे हैं।”
“मौजूदा परिस्थितियों में उनका सारा समय एवं धन उन्हें बचाने में खर्च हो रहा है… आज वह अपने ही आवास में क्वारंटीन में रह रहे हैं। विधानसभा सत्र में भी भाग नहीं ले सके। इस समय तो नर्स या डॉक्टर को भी अनुमति नहीं… यदि उनके जीवन को कोई हानि होती है तो ये संवेदनहीन संस्थाएं जिम्मेदार होंगी।”
“माननीय न्यायालय भी दुर्लभतम अपराधों में दया दिखाते हैं… प्रभु ऐसे लोगों को सद्बुद्धि दें।”
यह पोस्ट न सिर्फ परिवारिक लगाव दिखाती है, बल्कि सत्ता के अंदर की आवाज भी बन गई।
मायावती-अखिलेश का एक सुर – “मानवता के खिलाफ”
मायावती ने साफ कहा – “पूर्ण ईमानदारी से काम किया। कोई शिकायत नहीं। बीमारी में कार्रवाई अति-दुर्भाग्यपूर्ण और मानवता के खिलाफ।”
अखिलेश यादव ने इसे “चुनिंदा निशाना” बताया। बोले – “बीजेपी का कोई होता तो छापा नहीं पड़ता।”
दोनों प्रमुख विपक्षी दलों का एक साथ आना और सत्ता पक्ष के मंत्री का समर्थन – यह UP की राजनीति में कम ही देखने को मिलता है।
क्यों इतना विवाद? टाइमिंग का सवाल
सवाल सिर्फ छापे का नहीं, टाइमिंग का है।
- विधायक दो साल से बीमार
- हाल ही में अमेरिका से लौटे
- क्वारंटाइन में
- विधानसभा नहीं जा पा रहे
- CM यूपी से बाहर (जापान दौरा)
कई नेता पूछ रहे हैं – क्या शिकायत मिलने पर भी स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर इंतजार नहीं किया जा सकता था?
न्यायालय अक्सर गंभीर बीमारी में राहत देते हैं। फिर एजेंसियां क्यों नहीं?
सामाजिक न्याय, बहुजन समाज और संवेदना का आयाम
बहुजन समाज पार्टी का एकमात्र विधायक होने के नाते उमाशंकर सिंह दलित-पीछड़े-मुस्लिम-ठाकुर सबके प्रतिनिधि माने जाते हैं। बीएसपी की विचारधारा “सबका साथ, सबका विकास” नहीं बल्कि “बहुजन हिताय” पर टिकी है।
ऐसे में एक बीमार विधायक पर कार्रवाई को कई लोग “राजनीतिक प्रतिशोध” मान रहे हैं। चाहे जाति कुछ भी हो, लेकिन संविधान का अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार – हर नागरिक के लिए समान है।
भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?
2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं।
- यह घटना विपक्ष को एकजुट करने का मौका दे सकती है।
- बीजेपी के अंदर भी “संवेदनशीलता” पर बहस छिड़ सकती है।
- आम जनता में एजेंसियों के प्रति विश्वास प्रभावित हो सकता है – “क्या बीजेपी वाले बच जाते हैं?”
- अगर छापे में कुछ नहीं निकला तो सरकार की छवि पर असर। अगर कुछ निकला तो भी “बीमारी का फायदा” वाला नैरेटिव चल सकता है।
UP की सियासत में परिवारिक रिश्ते अक्सर पार्टियों से ऊपर उठ जाते हैं। दिनेश प्रताप सिंह का बयान उसी का उदाहरण है।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश की इस घटना ने एक बार फिर साबित किया कि राजनीति सिर्फ वोट और सत्ता की नहीं, बल्कि इंसान होने की भी है। उमाशंकर सिंह चाहे किसी भी पार्टी के हों, उनकी बीमारी में संवेदना दिखाना हर संवेदनशील इंसान का फर्ज है।
योगी सरकार के मंत्री का खुला विरोध इस बात का प्रमाण है कि परिवार और इंसानियत सत्ता की दीवारों को तोड़ सकती है।
अब सवाल ये हैं:
- क्या केंद्र की एजेंसियां भविष्य में गंभीर बीमार नेताओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देंगी?
- क्या परिवारिक रिश्ते सियासी दुश्मनी से ऊपर उठ सकते हैं?
- 2027 में उत्तर प्रदेश के मतदाता “संवेदनशील सत्ता” को वोट देंगे या “सख्त कानून” को?

