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| Image: Bahu JagjivanRam Statue, Hyderabad. |
कल्पना कीजिए... 1908 का बिहार। एक छोटा-सा गाँव चंदवा, जहाँ सूरज की पहली किरण भी अछूत समझी जाती थी। एक गरीब चमार परिवार में एक बच्चा पैदा होता है, जिसका नाम रखा जाता है जगजीवन। समाज उसे छूने तक से कतराता है, लेकिन वही बच्चा एक दिन भारत के रक्षा मंत्री बनकर 1971 के युद्ध में देश की विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। बाबू जगजीवन राम का जीवन सिर्फ एक राजनेता की कहानी नहीं, बल्कि समता, संघर्ष और अटूट इच्छाशक्ति का जीता-जागता प्रमाण है।
आज जब हम सामाजिक न्याय की बात करते हैं, तब बाबू जगजीवन राम का जीवन हमें याद दिलाता है कि कोई भी दीवार कितनी भी ऊँची क्यों न हो, मेहनत और साहस से उसे पार किया जा सकता है। यह लेख उनकी पूरी यात्रा को कहानी की तरह बुनता है – जन्म से लेकर विरासत तक। तैयार हैं? चलिए, इस प्रेरणादायक सफर पर निकलते हैं।
प्रारंभिक जीवन: गरीबी और छुआछूत की आग में तपना
बाबू जगजीवन राम का जीवन शुरू होता है 5 अप्रैल 1908 को बिहार के भोजपुर जिले (तब शाहाबाद) के चंदवा गाँव में। पिता शोभी राम ब्रिटिश सेना में थे, लेकिन ऊँची जाति के अफसरों के व्यवहार से तंग आकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और गाँव में खेती करने लगे। वे शिव नारायणी संप्रदाय के महंत थे – धार्मिक, सादा और मानवीय मूल्यों से भरे। माँ वसंती देवी ने भी उन्हें साहस और धैर्य सिखाया।
पिता की असामयिक मृत्यु के बाद परिवार पर आर्थिक बोझ आ गया। छोटे जगजीवन को स्कूल जाते वक्त रास्ते में तरह-तरह के अपमान झेलने पड़ते। लेकिन माँ का आशीर्वाद और अपनी लगन ने उन्हें आगे बढ़ाया। बाबू जगजीवन राम के जीवन में यह दौर सबसे भावुक है – जब एक दलित बालक को स्कूल में अलग पानी का घड़ा दिया जाता था।
उनकी जीवनी में वर्णित एक प्रसिद्ध घटना के अनुसार, आराह टाउन स्कूल में हिंदू और मुस्लिम छात्रों के लिए अलग-अलग घड़े थे। जगजीवन ने हिंदू घड़े से पानी पी लिया तो स्कूल ने तीसरा घड़ा दलितों के लिए रख दिया। जगजीवन ने उसे दो बार तोड़ दिया। आखिरकार प्रिंसिपल को घड़ा हटाना पड़ा। यहीं से उनकी समता की लड़ाई शुरू हुई।
शिक्षा: भेदभाव के बावजूद चरम सफलता
आराह से मैट्रिक प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद 1927 में पंडित मदन मोहन मालवीय के निमंत्रण पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) पहुँचे। लेकिन यहाँ भी जाति भेदभाव का सामना करना पड़ा। स्थानीय नाई बाल कटवाने से मना कर देते। एक दलित नाई कभी-कभी मदद करता। भोजन में भी भेदभाव।
फिर भी जगजीवन ने इंटर साइंस पास किया। अंत में कलकत्ता विश्वविद्यालय से 1931 में B.Sc. उच्च अंकों से पूरा किया। कलकत्ता में उन्होंने रविदास सम्मेलन आयोजित किए, गुरु रविदास जयंती मनाई और दलितों को संगठित किया। बाबू जगजीवन राम के जीवन में शिक्षा का यह अध्याय सिखाता है – ज्ञान ही सबसे बड़ा हथियार है।
स्वतंत्रता संग्राम में कदम: गांधी से मुलाकात और आंदोलन
1934 के बिहार भूकंप में उन्होंने राहत कार्य किया। यहीं महात्मा गांधी से पहली मुलाकात हुई। गांधीजी ने उन्हें “तपे हुए सोने” की उपमा दी। 1931 में कांग्रेस में शामिल होकर उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में 19 अगस्त को गिरफ्तार हुए और जेल गए।
बाबू जगजीवन राम के जीवन में आंदोलन का हिस्सा सबसे रोमांचक है। उन्होंने 1935 में अखिल भारतीय दलित वर्ग लीग की स्थापना की। 1934 में अखिल भारतीय रविदास महासभा बनाई। 1937 में खेतिहर मजदूर सभा बनाकर किसान-मजदूरों को संगठित किया। 1935 में हैमंड कमिटी के सामने दलितों के मताधिकार की माँग रखी – जो ऐतिहासिक थी।
1936 में मात्र 28 साल की उम्र में बिहार विधान परिषद के नामित सदस्य बने। 1937 में बिहार विधानसभा के लिए निर्विरोध चुने गए।
स्वतंत्र भारत: कैबिनेट में लंबा सफर
1946 में अंतरिम सरकार में सबसे युवा मंत्री के रूप में श्रम मंत्री बने। स्वतंत्रता के बाद भी 31 साल से ज्यादा कैबिनेट में रहे – भारत के सबसे लंबे समय तक मंत्री रहने वाले नेता।
- श्रम मंत्री (1946-52, 1966-67): न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, कर्मचारी राज्य बीमा (ESI), भविष्य निधि जैसे कानून बनाए।
- संचार मंत्री (1952-56): उनके कार्यकाल में नागरिक उड्डयन का राष्ट्रीयकरण लागू हुआ।
- रेल मंत्री (1956-62): रेलवे का आधुनिकीकरण, 5 साल तक किराया नहीं बढ़ाया।
- कृषि मंत्री (1967-70 और 1974-77): कृषि मंत्री के रूप में उन्होंने हरित क्रांति की नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन में प्रमुख भूमिका निभाई। 1974 के सूखे में भारत को खाद्यान्न संकट से बचाया। डॉ. नॉर्मन बोरलॉग के साथ मिलकर देश को अनाज में आत्मनिर्भर बनाया।
- रक्षा मंत्री (1970-74 और 1977-79): 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य तैयारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे बांग्लादेश मुक्ति संभव हुई।
- 1979 में चरण सिंह सरकार में उपप्रधानमंत्री बने।
1977 में आपातकाल का विरोध करते हुए इंदिरा गांधी की सरकार से इस्तीफा दिया। कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाई, जनता पार्टी में शामिल हुए।
बाबू जगजीवन राम के जीवन में यह दौर दिखाता है कि सत्ता कभी भी व्यक्तिगत नहीं, बल्कि देश और दलितों के उत्थान के लिए थी।
रोचक तथ्य: जो आप नहीं जानते होंगे
- बाबू जगजीवन राम के जीवन में एक अनोखा तथ्य – वे स्वतंत्र भारत में सबसे लंबे समय तक केंद्रीय मंत्री रहने वाले नेताओं में से एक थे और कई दशकों तक संसद में सक्रिय रहे (1936 से 1986 तक लगभग 50 साल)।
- BHU में बाल कटवाने के लिए संघर्ष किया।
- स्कूल में अलग घड़े की प्रथा तोड़ी।
- 1928 में कलकत्ता में 50,000 मजदूरों की रैली आयोजित की – नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ध्यान दिया।
- एक लोकप्रिय राजनीतिक कथा के अनुसार, 1977 के चुनाव में रामलीला मैदान की रैली इतनी बड़ी हुई कि दूरदर्शन ने फिल्म “बॉबी” दिखाकर रोकने की कोशिश की, लेकिन अखबारों में हेडलाइन बनी – “Babu beats Bobby”।
- वे बहुभाषी थे – अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत, बंगाली में पारंगत।
- पुत्र सुरेश कुमार का 1978 में विवादित फोटो कांड जनता पार्टी के विभाजन का एक कारण बना।
- उनकी जयंती को “समता दिवस” के रूप में मनाया जाता है।
उनके विचार और नारे: समता का संदेश
बाबू जगजीवन राम का जीवन उनके विचारों से पूरा होता है। वे कहते थे – “समानता ही सच्ची आजादी है।” गुरु रविदास की शिक्षाओं से प्रेरित होकर उन्होंने जाति-विहीन समाज का सपना देखा। उनका मुख्य नारा था – “शिक्षा, संघर्ष और संगठन”। उन्होंने कहा, “दलितों को सिर्फ आरक्षण नहीं, सम्मान चाहिए।”
वे गांधीजी के हरिजन उद्धार और आंबेडकर के सामाजिक न्याय दोनों को मानते थे, लेकिन कांग्रेस के माध्यम से अंदर से बदलाव लाने में विश्वास रखते थे।
मृत्यु और विरासत: आज भी जीवित
6 जुलाई 1986 को दिल्ली में 78 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। अंतिम संस्कार समता स्थल पर हुआ, जो आज तीर्थ स्थल है। पुत्री मीरा कुमार ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाया – वे लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।
बाबू जगजीवन राम का जीवन आज भी प्रासंगिक है। जब आरक्षण पर बहस होती है, जब दलित युवा संघर्ष करते हैं, तब उनकी कहानी याद आती है। बाबू जगजीवन राम राष्ट्रीय फाउंडेशन, उनके नाम पर अस्पताल, स्कूल, रेलवे अकादमी – सब उनकी याद में हैं। 1971 की विजय और हरित क्रांति आज भी देश को मजबूत बनाए हुए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. बाबू जगजीवन राम को बाबूजी क्यों कहा जाता है?
बाबूजी एक सम्मान और स्नेह का उपनाम है, जो उनके साथी और आम जनता ने दिया। यह उनके सादगीपूर्ण, जन-नेता जैसे व्यक्तित्व को दर्शाता है।
2. 1971 के युद्ध में उनकी क्या भूमिका थी?
रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व प्रदान किया, सैन्य तैयारी को मजबूत किया और युद्ध की रणनीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे भारत की जीत और बांग्लादेश का निर्माण हुआ।
3. हरित क्रांति में उनका योगदान क्या था?
कृषि मंत्री के तौर पर उन्होंने हरित क्रांति की नीतियों को लागू करवाया, किसानों को समर्थन दिया और 1974 के सूखे में देश को भुखमरी से बचाया, भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाई।
निष्कर्ष: प्रेरणा का अनंत स्रोत
बाबू जगजीवन राम का जीवन परिचय खत्म नहीं होता। यह हर उस व्यक्ति के लिए है जो सोचता है – “मैं कमजोर हूँ, मेरा जन्म गरीब परिवार में हुआ है।” बाबूजी साबित करते हैं कि जन्म नहीं, कर्म तय करता है भविष्य।
आज उनके 118वें जन्मदिन पर हम वादा करें – समता का सपना पूरा करेंगे। क्योंकि बाबूजी नहीं चाहते थे कि कोई भी बच्चा चंदवा गाँव जैसी पीड़ा झेले।
बाबू जगजीवन राम का जीवन परिचय हमें सिखाता है – उठो, लड़ो, जीतो। जय समता! जय भारत!
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