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कल्पना कीजिए...उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में रामदुलारी, एक दलित महिला, अपनी मां की जमीन पर दावा करती है। रिवाज कहता है — “बेटी को हिस्सा नहीं।” ठीक बगल में सकीना बीबी, एक पसमांदा मुस्लिम महिला, तीन तलाक के डर से रातें नहीं सो पाती। दोनों बहुजन समाज की हैं — एक हिंदू दलित, दूसरी मुस्लिम पिछड़ी। लेकिन कानून उन्हें अलग-अलग तराजू पर तोलता है।
रामदुलारी आंसू पोछते हुए कहती है, “बाबासाहेब ने तो कहा था सब बराबर होंगे... फिर ये फर्क क्यों?”
यह फर्क खत्म करने का नाम है Uniform Civil Code (UCC) या समान नागरिक संहिता। यह कोई साधारण कानून नहीं, बल्कि बहुजन समाज के लिए सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी लड़ाई है।
27 जनवरी 2025 को उत्तराखंड ने UCC लागू किया — स्वतंत्र भारत का पहला राज्य। और ठीक एक साल बाद, 27 जनवरी 2026 को UCC (संशोधन) अध्यादेश लागू हो गया, जिसमें लाइव-इन संबंधों में धोखाधड़ी रोकने के लिए सख्त प्रावधान जोड़े गए।
यह लेख सिर्फ कानूनी बात नहीं करेगा। यह उस सपने की कहानी है जो डॉ. भीमराव अंबेडकर ने देखा था — एक ऐसे भारत का जहां जाति, धर्म या लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न हो। आइए, इस सफर को बहुजन दृष्टिकोण से समझते हैं।
UCC क्या है? समान नागरिक संहिता की आसान परिभाषा
UCC क्या है? सरल भाषा में — एक ऐसा कानून जो विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेना और भरण-पोषण जैसे निजी मामलों में हर नागरिक के लिए एक ही नियम लागू करे। हिंदू हो, मुस्लिम, सिख, ईसाई या कोई भी — सबके लिए समान।
समान नागरिक संहिता का मतलब है — “नागरिक पहले, फिर धर्म।” आज हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम बेटी को बराबर हिस्सा देता है, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ में बेटी को भाई का आधा। एक जगह बहुविवाह प्रतिबंधित है, दूसरी जगह नहीं। UCC इन सब फर्कों को मिटा देगा।
संविधान के अनुच्छेद 44 में साफ लिखा है — “राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।” बाबासाहेब जानते थे कि बिना एक समान कानून के सामाजिक न्याय अधूरा रहेगा।
UCC का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: बाबासाहेब की अटल लड़ाई
कहानी 1948 की संविधान सभा से शुरू होती है। बहस गरम थी। कुछ सदस्य चिल्ला रहे थे — “हमारा पर्सनल लॉ मत छुओ!”
डॉ. अंबेडकर खड़े हुए। उन्होंने साफ कहा — “मैं नहीं समझता कि एक धर्मनिरपेक्ष देश में व्यक्तिगत कानूनों को धर्म से क्यों जोड़ा जाए।” उन्होंने जोर देकर कहा कि राज्य को कानून बनाने का पूरा अधिकार है।
बाबासाहेब ने हिंदू कोड बिल पेश किया — जिसमें विधवा पुनर्विवाह, बेटी को संपत्ति का अधिकार, तलाक जैसे प्रावधान थे। लेकिन रूढ़िवादी ताकतों का इतना विरोध हुआ कि 1951 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। उन्होंने कहा था — “मैं हिंदू समाज को बचाने के लिए कानून लाना चाहता था, लेकिन अगर समाज तैयार नहीं तो मैं चला जाता हूं।”
फिर भी उन्होंने अनुच्छेद 44 में UCC को जगह दिलाई। बाबासाहेब ने सुझाव दिया था — शुरू में इसे स्वैच्छिक रखो, धीरे-धीरे अनिवार्य बनाओ। यह तर्क आज भी विरोधियों के “जबरन थोपने” वाले आरोप का करारा जवाब है।
1955-56 में हिंदू कानून बने, लेकिन मुस्लिम, ईसाई पर्सनल लॉ वैसे के वैसे रह गए। सिर्फ गोवा में पुर्तगाली सिविल कोड (1867) जारी रहा, जो UCC की तरह काम करता है।
बहुजन समाज के लिए UCC: पसमांदा से दलित तक सामाजिक न्याय की कुंजी
बहुजन मतलब — SC, ST, OBC, पसमांदा मुस्लिम, ईसाई और अन्य पिछड़े — यानी भारत की 85% आबादी।
बहुजन दृष्टिकोण में UCC अंबेडकरवादी क्रांति का अगला चरण है।
- महिलाओं का सशक्तिकरण: पसमांदा मुस्लिम महिलाओं को तलाक और बहुविवाह से मुक्ति। दलित-बहुजन बेटियों को बराबर संपत्ति। उत्तराखंड UCC में बेटी-बेटे का समान अधिकार साफ है।
- जाति-धर्म की दीवार तोड़ना: पर्सनल लॉ फूट डालते हैं। UCC कहता है — “एक कानून, एक न्याय।”
- पसमांदा मुस्लिम बहुजन का सबसे बड़ा फायदा: सकीना बीबी जैसी लाखों महिलाओं को अब डर नहीं सताएगा। पसमांदा समाज UCC को इसलिए समर्थन दे रहा है क्योंकि यह उन्हें रूढ़िवादी ताकतों से आजादी दिलाएगा।
मायावती जी ने सही कहा — “UCC का विचार अच्छा है, लेकिन भाजपा के तरीके से नहीं।” यानी सिद्धांत में हां, लेकिन सहमति और जागरूकता से लागू हो। यही बहुजन लाइन है — सबको साथ लेकर चलो।
संघर्ष और आंदोलन: शाह बानो से उत्तराखंड तक
1985 — शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने UCC की सिफारिश की। 1995 — सरला मुद्गल मामले में फिर कहा। 2017 — शायरा बानो मामले में ट्रिपल तलाक पर रोक।
महिलाओं के आंदोलन ने रास्ता दिखाया। उत्तराखंड में 2022 चुनाव वादे के बाद फरवरी 2024 में बिल पास हुआ। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद 27 जनवरी 2025 को लागू।
27 जनवरी 2026 को UCC (संशोधन) अध्यादेश लागू हुआ — जिसमें लाइव-इन पार्टनर की जानकारी छिपाकर धोखाधड़ी करने पर सख्त सजा, रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया और स्पष्ट प्रावधान जोड़े गए। ST समाज को छूट दी गई — उनकी रीति-रिवाज सुरक्षित। यही बहुजन संवेदनशीलता है।
रोचक तथ्य: UCC से जुड़ी अनकही बातें
- गोवा का सबक: 1867 के पुर्तगाली सिविल कोड को 1961 में भी जारी रखा गया। वहां विवाह, तलाक, विरासत सब एक समान हैं। मुस्लिम पुरुषों को बहुविवाह की अनुमति नहीं। हिंदू पुरुषों को कुछ पुरानी सीमित परिस्थितियों में दूसरी शादी की छूट थी, लेकिन व्यावहारिक रूप से नाममात्र रह गई है। महिलाओं की स्थिति बेहतर है।
- बाबासाहेब का स्वैच्छिक तर्क: “मैं कल ही सिविल कोड ला सकता हूं, लेकिन शुरू में स्वैच्छिक रखो।” — यह बात आज भी प्रासंगिक है।
- सुप्रीम कोर्ट के चार बड़े फैसले: शाह बानो, सरला मुद्गल, जॉन वल्लामट्टम, शायरा बानो — हर बार UCC की बात आई।
- उत्तराखंड UCC के खास प्रावधान: न्यूनतम विवाह आयु 21-18, बेटी-बेटे समान विरासत, लाइव-इन रजिस्ट्रेशन अनिवार्य, 2026 संशोधन में धोखाधड़ी पर 3 साल तक की सजा।
- भारत में 80% कानून पहले से यूनिफॉर्म: IPC, CrPC, Contract Act — सब एक हैं। सिर्फ पर्सनल लॉ बचा था।
सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव: बहुजन विरासत को नई ताकत
UCC सांस्कृतिक विविधता खत्म नहीं करेगा। त्योहार, रीति-रिवाज, खान-पान वैसे रहेंगे। सिर्फ कानूनी अधिकार बराबर होंगे।
बहुजन समाज के लिए यह मानसिक गुलामी से मुक्ति है। सदियों से ब्राह्मणवादी और रूढ़िवादी ताकतें पर्सनल लॉ के नाम पर फूट डालती रहीं। UCC कहता है — “एक भारत, एक कानून, एक न्याय।”
प्रभाव:
- पसमांदा और दलित महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ेगा।
- अंतर-जाति, अंतर-धर्म विवाह आसान।
- सामाजिक सद्भाव मजबूत।
- बहुजन युवा बिना बंधनों के आगे बढ़ेंगे।
आज की प्रासंगिकता: 2026 का बहुजन भारत
फरवरी 2026 में उत्तराखंड UCC एक साल पूरा कर चुका है और संशोधनों के साथ और मजबूत हो गया है। UP, MP, गुजरात जैसे बहुजन बहुल राज्यों में बहस तेज है।
रामदुलारी और सकीना बीबी की कहानी अब हर बहुजन घर की कहानी है।
निष्कर्ष: बाबासाहेब का सपना — अब हमारी जिम्मेदारी
दोस्तों, UCC बहुजन क्रांति का हथियार है। यह नफरत नहीं, न्याय फैलाएगा। डॉ. अंबेडकर ने कहा था — “मैं समाज को तोड़ना नहीं, जोड़ना चाहता हूं — लेकिन बराबरी पर।”
आज बहुजन समाज को आगे आना है। UCC को किसी एक पार्टी का एजेंडा मत बनने दो। इसे अंबेडकर का एजेंडा बना दो। सहमति बनाओ, जागरूकता फैलाओ, पसमांदा-दलित-आदिवासी महिलाओं को आगे लाओ।
जब रामदुलारी को अपनी जमीन मिलेगी, जब सकीना बीबी बिना डरे जीएगी, तभी हम कह सकेंगे — बाबासाहेब, आपका सपना साकार हो रहा है।
जय भीम! जय समानता!
FAQ: UCC पर आपके मन के सवाल
Q1. बाबासाहेब UCC के पक्ष में थे?
हां, पूरी ताकत से। उन्होंने अनुच्छेद 44 रखवाया और शुरू में स्वैच्छिक रखने का सुझाव दिया।
Q2. बहुजन समाज को फायदा क्या?
पसमांदा मुस्लिम महिलाओं को तलाक से मुक्ति, दलित बेटियों को संपत्ति, जाति-धर्म की दीवार टूटेगी।
Q3. क्या UCC संस्कृति खत्म कर देगा?
नहीं। सिर्फ कानूनी नियम एक होंगे। रीति-रिवाज, त्योहार वैसे रहेंगे।
Writter & Editor-
Abhishek Kumar

