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| image: Representational image of Indian female government officer / AI generated for editorial use |
संत कबीर नगर: कल्पना कीजिए – एक महिला अधिकारी अपने चैंबर में बैठी सरकारी काम निपटा रही है। बाहर गांव के लोग इंतजार कर रहे हैं। तभी एक प्रभावशाली नेता अंदर घुसता है। पहले दबाव, फिर गाली-गलौज... और फिर वो शर्मनाक पल जब वो अपने कपड़े उतारकर अर्धनग्न खड़ा हो जाता है। साथ में एक दलित पंचायत सचिव को जातिसूचक गालियां देते हुए डंडा लेकर दौड़ाता है।
यह कोई फिल्मी सीन नहीं, बल्कि 24 फरवरी 2026 की सच्ची घटना है। उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले के पौली विकास खंड की खंड विकास अधिकारी श्वेता वर्मा और दलित पंचायत सचिव रमाकांत के साथ हुई यह घटना अब पूरे प्रदेश की सुर्खियों में है। और सबसे चौंकाने वाली बात – घटना के 48 घंटे बाद भी आरोपी भाजपा मंडल अध्यक्ष अरविंद सिंह के खिलाफ सख्त एक्शन नहीं लिया गया तो कर्मचारियों ने पूरे जिले के 9 ब्लॉकों में तालाबंदी कर दी। विकास भवन का मुख्य गेट बंद। SIR कार्य रुक गया। ग्रामीणों को परिवार रजिस्टर की नकल तक नहीं मिल रही।
यह सिर्फ एक स्थानीय विवाद नहीं है। यह सवाल है – क्या सत्ता के करीबी होने पर कानून भी नजरअंदाज हो जाता है? क्या महिला सुरक्षा और दलित सम्मान सिर्फ चुनावी नारे हैं?
घटना का पूरा सच: राशन कार्ड से शुरू हुआ तूफान
मंगलवार 24 फरवरी को पौली ब्लॉक में सब कुछ सामान्य था। BDO श्वेता वर्मा SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) संबंधी काम निपटा रही थीं। दोपहर में अमौली गांव निवासी और भाजपा के पौली मंडल अध्यक्ष अरविंद सिंह राशन कार्ड से जुड़े प्रार्थना-पत्र लेकर पहुंचे।
बीडीओ के अनुसार, उन्होंने तत्काल हस्ताक्षर और रिपोर्ट लगाने का दबाव बनाया। “हस्ताक्षर किए बिना किसी को ब्लॉक से जाने नहीं देंगे” – यह उनकी कथित बात थी। जब काम नहीं हुआ तो विवाद शुरू हो गया। श्वेता वर्मा की तहरीर में साफ लिखा है – आरोपी ने गाली-गलौज की, अभद्रता की और उनके सामने अर्धनग्न हो गए।
दलित पंचायत सचिव रमाकांत बताते हैं कि अरविंद सिंह ने उन पर जातिसूचक गालियां बरसाईं, जान से मारने की धमकी दी और डंडा लेकर दौड़ाया। एक महिला अधिकारी के सामने यह सब होना न सिर्फ अपमानजनक था, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 17 (छुआछूत का अंत) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का सीधा उल्लंघन था।
श्वेता वर्मा घंटों धनघटा थाने में बैठी रहीं। लेकिन पुलिस ने मुकदमा दर्ज करने की बजाय समझौते का दबाव बनाया। यहीं से गुस्सा फूट पड़ा।
कर्मचारियों का आक्रोश: “FIR दर्ज होने तक काम बंद”
23 फरवरी की रात से लेकर 26 फरवरी दोपहर तक स्थिति बिगड़ती गई। ग्राम पंचायत अधिकारी संघ के जिलाध्यक्ष क्षितिज चौधरी ने साफ कहा –
“सख्त धाराओं में दर्ज हो एफआईआर... जब तक भाजपा नेता अरविंद सिंह के खिलाफ सख्त धाराओं में एफआईआर दर्ज नहीं होती, तब तक विकास भवन सहित पूरे जिले में कामकाज ठप रहेगा।”
ग्राम विकास अधिकारी संघ और कर्मचारी एसोसिएशन ने भी एकजुट होकर अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार का ऐलान कर दिया। नाथनगर, हैसर बाजार, खलीलाबाद, सांथा, मेहदावल, सेमरियांवा – हर ब्लॉक मुख्यालय पर ताले लग गए।
परिणाम?
- SIR कार्य पूरी तरह ठप
- त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की तैयारियां प्रभावित
- गरीबों को राशन, पेंशन, आवास योजना से जुड़े दस्तावेज नहीं मिल रहे
- ग्रामीण विकास योजनाओं का अमल रुक गया
अरविंद सिंह का पक्ष: “रिश्वत मांगी गई, मैं पीड़ित हूं”
घटना के बाद अरविंद सिंह ने भी धनघटा थाने में तहरीर दी। उनके अनुसार, तीन महीने पहले राशन कार्ड के लिए आवेदन किया था। सचिव रमाकांत ने रिपोर्ट लगाने के लिए 2000 रुपये मांगे। पैसे न देने पर रिपोर्ट नहीं लगाई। जब शिकायत की तो BDO और सचिव ने मिलकर अपशब्द कहे, धक्का-मुक्की की और जान से मारने की धमकी दी।
धनघटा पुलिस ने उनके मामले में BDO श्वेता वर्मा और रमाकांत के खिलाफ BNS की धारा 115(2), 352, 351(3) तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 एवं 13 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया। जांच डिप्टी एसपी अभयनाथ मिश्रा को सौंपी गई।
दोनों पक्षों की शिकायतें दर्ज हैं। लेकिन कर्मचारी संगठन कह रहे हैं – “पहले महिला और दलित पर हुए अत्याचार की FIR सख्त धाराओं में हो, फिर बाकी देखेंगे।”
सामाजिक न्याय का सवाल: दलित सचिव पर जातिगत हमला क्यों?
रमाकांत दलित समुदाय से हैं। उन पर जातिसूचक गालियां और डंडे से हमला – यह SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 का क्लियर केस है। लेकिन FIR में ये धाराएं अभी तक नहीं जोड़ी गईं।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान में समानता का जो बीज बोया था, वह आज भी जड़ें पकड़ नहीं पा रहा। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां बहुजन समाज बड़ी ताकत है, ऐसे मामले बार-बार सामने आते हैं। क्या सत्ता पक्ष के नेता होने से कानून की नजर अलग हो जाती है?
महिला BDO श्वेता वर्मा का मामला भी चिंताजनक है। सरकारी कार्यालय में महिला अधिकारी के साथ ऐसा व्यवहार – यह प्रशासनिक सुरक्षा का सवाल है।
प्रशासन की भूमिका: जीरो टॉलरेंस का ठेंगा?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बार-बार ‘अपराध मुक्त प्रदेश’ और ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करते हैं। जिलाधिकारी आलोक कुमार ने आरोपी से सिर्फ माफी मंगवाने का आश्वासन दिया। सीडीओ जयकेश त्रिपाठी ने “मामले का हल निकालने” की बात कही।
लेकिन कर्मचारी पूछ रहे हैं – माफी से महिला का अपमान और दलित का शोषण मिट जाएगा?
यह घटना स्थानीय प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठाती है। क्या राजनीतिक दबाव इतना बड़ा है कि थाना-कचहरी भी नहीं सुन पा रही?
निष्कर्ष: न्याय मिले या सत्ता जीते?
संत कबीर नगर की यह घटना सिर्फ एक ब्लॉक की नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश की व्यवस्था की परीक्षा है। अगर सख्त कार्रवाई होती है तो यह संदेश जाएगा कि कोई भी नेता कानून से ऊपर नहीं। अगर मामला दब गया तो कर्मचारी, महिला अधिकारी और दलित समाज का विश्वास टूट जाएगा।
अब सवाल आपके सामने हैं:
- क्या राजनीतिक रसूख वाले लोगों पर कानून लागू होता है या नहीं?
- महिला अधिकारी और दलित कर्मचारी को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी प्रशासन की है या सिर्फ कागजों तक सीमित?
- क्या विकास कार्यों को राजनीति से अलग रखा जा सकता है?
न्याय की प्रतीक्षा में पूरा संत कबीर नगर सड़क पर है। अब देखना है – प्रशासन कितनी जल्दी सुनता है। यह भी पढ़ें: कर्नाटक दलित दंपति मंदिर अपमान: पुलिस एक्शन

