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| Image: Facebook Page, Ashish Pandey. |
कल सुबह जब बसपा कार्यकर्ताओं ने अपने मोबाइल पर नोटिफिकेशन देखा, तो कई की आंखें चमक उठीं। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कुमारी मायावती ने यूपी विधानसभा चुनाव 2027 के लिए पहला टिकट घोषित कर दिया। और ये टिकट किसी साधारण नेता को नहीं, बल्कि ब्राह्मण समाज के एक स्थानीय चेहरे आशीष पांडे को मिला – सीट है मधोगढ़ (जालौन जिला, बुंदेलखंड)।
ये सिर्फ एक टिकट नहीं है। ये एक सिग्नल है। एक ऐसा सिग्नल जो कह रहा है – बहुजन की राजनीति अब फिर से सर्वसमाज को साथ लेकर आगे बढ़ने वाली है।
पिछले कुछ महीनों से मायावती जी ब्राह्मण समाज की उपेक्षा, अपमान और असुरक्षा के मुद्दे लगातार उठा रही हैं। 15 जनवरी को अपने 70वें जन्मदिन पर उन्होंने साफ कहा था कि ब्राह्मण भाई-बहन उनसे मिलकर अपनी पीड़ा बता रहे हैं। 6 फरवरी को फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ पर तीखा हमला बोला। और 7 फरवरी को पार्टी की बड़ी बैठक में उन्होंने पूछा – “क्या किसी और पार्टी या सरकार ने ब्राह्मणों को उतना सम्मान, पद और सुरक्षा दी जितनी बसपा ने दी?”
आशीष पांडे कौन हैं? क्यों चुना गया उन्हें?
आशीष पांडे कुरौली क्षेत्र के एक स्थानीय व्यापारी और समर्पित बसपा कार्यकर्ता हैं। बुंदेलखंड प्रभारी लालाराम अहिरवार ने कार्यकर्ता सम्मेलन में उनका नाम घोषित किया। बसपा की परंपरा के मुताबिक प्रभारी को ही बाद में आधिकारिक प्रत्याशी बनाया जाता है। इसलिए ये घोषणा पहले प्रत्याशी के रूप में देखी जा रही है।
क्षेत्र के लोग उन्हें साधारण लेकिन मेहनती नेता के रूप में जानते हैं। ब्राह्मण समाज की भावनाओं को समझने वाला, बसपा के बहुजन विचारधारा से पूरी तरह जुड़ा। मायावती जी ने ठीक यही संदेश देना चाहा – ब्राह्मण समाज अब बसपा के साथ खड़ा हो, तो 2007 दोहराया जा सकता है।
मधोगढ़ – बसपा का पुराना गढ़, नया मैदान
मधोगढ़ विधानसभा सीट बसपा के लिए हमेशा से खास रही है।
- 2007: बसपा के हरि ओम जीतकर आए
- 2012: बसपा के संतराम ने जीत दर्ज की
- 2017: भाजपा के मूलचंद्र निरंजन ने बसपा के गिरिश कुमार को हराया (मार्जिन 45,985 वोट)
- 2022: भाजपा के मूलचंद्र निरंजन फिर जीते, बसपा की शीतल कुशवाहा दूसरे नंबर पर (मार्जिन 34,974 वोट)
सीट पर बसपा का वोट शेयर कभी 24-28% के बीच रहा, लेकिन 2007-12 में ये गढ़ था। आशीष पांडे को टिकट देकर बसपा ने साफ संकेत दिया है – हम इस गढ़ को वापस लेने जा रहे हैं। और इस बार ब्राह्मण चेहरे के साथ।
ब्राह्मण राजनीति में मायावती का मास्टरस्ट्रोक
ये फैसला अचानक नहीं है। मायावती जी पिछले छह महीने से लगातार ब्राह्मण नेताओं से मुलाकात कर रही हैं। भाजपा, सपा और कांग्रेस के ब्राह्मण नेता उनके पास पहुंच रहे हैं। उन्होंने कहा – “ब्राह्मण बिरादरी को बसपा सरकार ने जो आदर-सम्मान दिया, वो किसी और ने नहीं दिया।”
2007 में बसपा ने 89 ब्राह्मणों को टिकट दिया था। नारा था – “हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है”। नतीजा? 206 सीटें, पूर्ण बहुमत। दलित वोट + ब्राह्मण वोट + कुछ पिछड़े और मुस्लिम वोट = अजेय गठजोड़।
आज फिर वही फॉर्मूला दोहराया जा रहा है। लेकिन इस बार थोड़ा अलग अंदाज में। मायावती जी कह रही हैं – बसपा अकेले लड़ेगी। कोई गठबंधन नहीं।
2027 का समीकरण: बसपा कितनी मजबूत वापसी कर सकती है?
यूपी की राजनीति में ब्राह्मण वोट निर्णायक साबित होते हैं। करीब 11-12% आबादी। 2007 में इन वोटों ने बसपा को सत्ता दिलाई। 2017-22 में ये वोट भाजपा के पास चले गए। अब मायावती जी इन्हें वापस लाना चाहती हैं।
अगर बसपा ब्राह्मण-दलित एकता दोहरा पाई, तो भाजपा के लिए मुश्किल हो सकती है। सपा का PDA फॉर्मूला भी प्रभावित होगा। क्योंकि ब्राह्मण वोट सपा के साथ कम ही जाते हैं।
बुंदेलखंड में बसपा की जड़ें गहरी हैं। जालौन, हमीरपुर, झांसी – इन इलाकों में बसपा कार्यकर्ता अभी भी सक्रिय हैं। आशीष पांडे का टिकट बुंदेलखंड में पहला संकेत है। होली के बाद कानपुर मंडल की 5 और सीटों पर प्रभारी घोषित होने वाले हैं।
सामाजिक न्याय का नजरिया: संविधान की भावना
मायावती जी हमेशा कहती आई हैं – बसपा बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम जी की विचारधारा पर चलती है। अंबेडकर जी ने कहा था – “सबको सम्मान, सबको अवसर”। बसपा उसी को लागू करती है।
जब ब्राह्मण समाज को फिल्मों में, मीडिया में, राजनीति में अपमानित महसूस होता है, तो बसपा उसकी आवाज बनती है। ये सामाजिक न्याय की व्यापक परिभाषा है – सिर्फ दलित नहीं, हर वंचित को साथ लेना।
ये फैसला दिखाता है कि बसपा अब भी बहुजन की सच्ची व्याख्या करती है – जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक – सब शामिल हैं।
क्या चुनौतियां हैं?
बसपा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं। 2022 में सिर्फ एक सीट। संगठन कमजोर। कार्यकर्ता निराश। लेकिन मायावती जी की सक्रियता, अखिलेश यादव के PDA में सेंध लगाने की कोशिश और ब्राह्मण नेताओं का बसपा में आना – ये संकेत सकारात्मक हैं।
आशीष पांडे को अब संगठन को मजबूत करना होगा। बूथ स्तर तक पहुंचना होगा। ब्राह्मण परिवारों में जाकर कहना होगा – “बहन जी फिर से सम्मान देने आई हैं।”
निष्कर्ष: 2027 का शंखनाद शुरू हो चुका है
मायावती ने कल जो कदम उठाया, वो सिर्फ एक टिकट नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। 2007 की यादें ताजा हो रही हैं। ब्राह्मण-बहुजन एकता का नया अध्याय लिखा जा रहा है।
क्या आशीष पांडे मधोगढ़ से जीतकर बसपा को नई उड़ान देंगे? क्या ब्राह्मण समाज इस बार बसपा के साथ खड़ा होगा? क्या 2027 में फिर से “हाथी” सत्ता के सिंहासन पर विराजमान होगा?
जवाब तो वक्त देगा। लेकिन एक बात तय है – यूपी की राजनीति फिर से रोचक होने वाली है। और केंद्र में हैं मायावती और उनका बहुजन एजेंडा।
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