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| Image: Representational Image AI-generated. |
उन्नाव: सुबह के 9 बजे।
एक 16 साल की लड़की, साधारण सलवार-कमीज में, ब्यूटी पार्लर से बटन लेने बाहर निकली। अगले ही पल एक काली कार रुकी। एक युवक उतरा, उसके मुंह पर कपड़ा डाला और उसे खींचकर कार में बिठा लिया।
यह कोई फिल्म का सीन नहीं। यह फरवरी 2026 की सच्ची घटना है – उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के अचलगंज क्षेत्र के बंथर गांव की।
एक दलित परिवार की बेटी, जो गरीबी से लड़कर सिलाई सीख रही थी ताकि घर चलाने में मदद कर सके, अचानक गायब। घंटों बाद शुक्लागंज की ओर जाते रास्ते पर, आजाद मार्ग चौराहे से 500 मीटर अंदर, उसे छोड़ दिया गया। डरी-सहमी, फोन उठाया और घर वालों को बताया – “मुझे अगवा कर लिया गया था।”
घटना का क्रम: सुबह 9 बजे क्या हुआ?
मंगलवार सुबह। किशोरी नियमित रूप से बंथर गांव के एक ब्यूटी पार्लर में सिलाई सीखने जाती थी। उस दिन भी गई। कुछ बटन खरीदने बाहर निकली तो काली गाड़ी में सवार दो अज्ञात युवकों ने उसे निशाना बनाया।
एक ने चेहरे पर कपड़ा डाला, दूसरे ने कार का दरवाजा खोला। लड़की चीख भी नहीं पाई। कार घूमती रही – इलाके में इधर-उधर। फिर शुक्लागंज रोड पर छोड़ दी गई।
परिवार को फोन आया। रोते-बिलखते घर वाले बदरका चौकी पहुंचे। तहरीर लिखी गई। अब मामला दर्ज।
पुलिस की जांच: संदेह या संवेदनशीलता की कमी?
बदरका चौकी प्रभारी उपनिरीक्षक अनिल त्रिपाठी ने कहा – “लड़की का आरोप मनगढ़ंत प्रतीत हो रहा है, फिर भी सीसीटीवी फुटेज से जांच की जा रही है।”
एक तरफ CCTV की बात, दूसरी तरफ “मनगढ़ंत” शब्द। यह विरोधाभास क्यों?
ग्रामीण इलाकों में अक्सर पीड़िता के बयान पर तुरंत संदेह किया जाता है – खासकर जब परिवार गरीब और दलित हो। क्या यह पूर्वाग्रह है? क्या दबाव है? या सच में कोई गड़बड़ी?
पीड़िता का परिवार: सपने देखने का हक भी छीन लिया?
16 साल की उम्र। पढ़ाई के साथ-साथ सिलाई। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी कि बेटी को कमाने का रास्ता ढूंढना पड़ा।
दलित परिवार। गांव में ऊंची जाति का दबदबा। लड़की का बाहर जाना भी कई बार टोका जाता होगा। फिर भी मां-बाप ने हौसला दिया – “सीख ले, आगे बढ़ेगी।”
आज वही हौसला टूटा हुआ है। घर में सन्नाटा। बहन-भाई डरे हुए। मां कहती होगी – “अब बाहर मत जाना बेटा।”
यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं। यह पूरे बहुजन समाज की पीड़ा है।
उन्नाव: महिलाओं की सुरक्षा का पुराना सवाल
उन्नाव का नाम सुनते ही कई पुरानी घटनाएं याद आ जाती हैं। 2017 का कुख्यात मामला हो या हाल के वर्षों के अपराध। NCRB 2023 के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के खिलाफ 15,130 मामले दर्ज हुए – देश में सबसे ज्यादा।
दलित महिलाओं पर अत्याचार की संख्या और भी चिंताजनक। ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियां स्कूल-कॉलेज छोड़ रही हैं। Skill India, PMKVY जैसी योजनाएं कागजों पर तो चल रही हैं, लेकिन जमीन पर सुरक्षा नहीं।
एक 16 साल की लड़की अगर सिलाई सीखने नहीं जा पाएगी तो आत्मनिर्भर कैसे बनेगी? बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा कितना खोखला लगता है जब सड़क पर निकलना ही मुश्किल हो।
कौशल विकास पर असर: लाखों लड़कियां प्रभावित
सरकार Skill India के तहत करोड़ों युवाओं को ट्रेनिंग दे रही है। ग्रामीण लड़कियों के लिए सिलाई, ब्यूटी पार्लर, कंप्यूटर कोर्स – ये जीवन बदलने वाले हैं।
लेकिन जब ट्रेनिंग सेंटर जाते वक्त अपहरण हो जाए तो? मां-बाप क्या सोचेंगे? “घर बैठो, सुरक्षित रहो।”
परिणाम? ड्रॉपआउट बढ़ेगा। आर्थिक स्वावलंबन रुकेगा। पीढ़ी दर पीढ़ी गरीबी और दमन जारी रहेगा।
सरकार को चाहिए – हर कौशल केंद्र के आसपास CCTV, पेट्रोलिंग, महिला सुरक्षा वॉरियर, हेल्पलाइन। न सिर्फ योजनाएं, बल्कि सुरक्षा गारंटी।
निष्कर्ष: अब चुप रहना अपराध है
यह घटना सिर्फ उन्नाव की नहीं। यह पूरे भारत की उन अनगिनत किशोरियों की है जो सपने देखती हैं लेकिन रास्ते में दीवार खड़ी हो जाती है।
हम सबको आवाज उठानी होगी – चाहे सोशल मीडिया हो, सड़क हो या अदालत।
क्योंकि जब एक दलित लड़की का सपना टूटता है, तो पूरा समाज पिछड़ जाता है।
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