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बाँदा(उ.प्र.): कल्पना कीजिए…रात के आठ बज रहे हैं। ठंडी हवा में अगरबत्ती की महक फैली हुई है। एक साधारण सा आदमी मां ज्वालामुखी के चरणों में झुककर धूपबत्ती जलाना चाहता है। बस यही। कोई बड़ा दावा नहीं, कोई प्रदर्शन नहीं। सिर्फ मन की शांति।
लेकिन बांदा के सिकहुला गांव में 21 फरवरी 2026 की उस रात यही छोटा सा सपना टूट गया। टूटा इतना बुरी तरह कि पूरे गांव में सन्नाटा छा गया और अब पूरे उत्तर प्रदेश में सवाल उठ रहे हैं – क्या 76 साल बाद आजादी के इस देश में मंदिर अब भी कुछ लोगों की जागीर बने हुए हैं?
घटना का क्रम: क्या हुआ उस रात?
21 फरवरी, शाम करीब 8 बजे। छेदू, सिकहुला गांव का रहने वाला अनुसूचित जाति का युवक, मां ज्वालामुखी मंदिर पहुंचा। हाथ में धूपबत्ती। जैसे हजारों भक्त रोज करते हैं।
लेकिन जैसे ही वह मंदिर के अंदर घुसा, गांव के कुछ लोग भड़क गए। छेद्दू उर्फ कुली सोनकर, कल्लू सोनकर, सर्वेश सोनकर और पुत्तू सोनकर को तुरंत रोक लिया।
अपमान भरी आवाज में कहा –“मंदिर के अंदर कैसे घुस गए? बाहर से धूपबत्ती लगाओ। हमें भी पूजा करनी है।”
डर के मारे छेदू बाहर आ गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। छेदू ने उसी समय अपनी मजदूरी मांगी। उस व्यक्ति ने गाली दी। थोड़ी देर बाद वह रिवॉल्वर लेकर तीन साथियों के साथ लौटा – राममगन सिंह, बिंदा सिंह, संजय सिंह और लाली।
फिर जो हुआ, वह शर्मनाक है। छेदू को घसीटकर मंदिर के प्रांगण में ले जाया गया। उसकी मां को भी नहीं बख्शा गया। दोनों को बुरी तरह पीटा गया। छेदू का मोबाइल और 2500 रुपये छीन लिए गए। पूरे घटनाक्रम में जातिगत गालियां भी बरसाई गईं।
पीड़ित छेदू: एक आम आदमी की असाधारण पीड़ा
छेदू कोई नेता नहीं, कोई कार्यकर्ता नहीं। वह गांव का साधारण मजदूर है। अनुसूचित जाति से आता है। उसने सिर्फ मां के दरबार में अपना सिर झुकाना चाहा था।
पुलिस को दिए शिकायती पत्र में उसने लिखा – “मैं मंदिर में धूपबत्ती जला रहा था। मुझे अपमानित करके बाहर निकाल दिया गया। फिर मारपीट की गई। मेरा मोबाइल और पैसे छीन लिए गए।”
उसकी मां भी चोटिल हुईं। दोनों का मेडिकल कराया गया।
आरोपी पक्ष का दावा और पुलिस की दोतरफा कार्रवाई
राममगन सिंह पक्ष ने भी पुलिस में तहरीर दी। उनके अनुसार छेदू और तीन अन्य सोनकरों ने उन पर हमला किया।
परिणाम? जसपुरा थाना (सिकहुला गांव) में दोनों पक्षों के कुल आठ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज।
छेदू की शिकायत पर राममगन सिंह, बिंदा सिंह, संजय सिंह और लाली के खिलाफ SC/ST एक्ट समेत मारपीट की धाराएं लगाई गईं। दूसरी तरफ राममगन सिंह की तहरीर पर छेदू उर्फ कुली सोनकर, कल्लू, सर्वेश और पुत्तू सोनकर के खिलाफ मारपीट का केस।
बांदा के एसपी के आदेश पर दोनों पक्षों का मेडिकल हुआ। जांच क्षेत्राधिकारी कर रहे हैं।
जातिगत भेदभाव: मंदिर में आज भी ‘अंदर-बाहर’ का खेल?
यह घटना अकेली नहीं। भारत के संविधान का अनुच्छेद 17 छूआछूत को अपराध घोषित करता है। अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है। 1955 का Untouchability (Offences) Act और 1989 का SC/ST (Prevention of Atrocities) Act साफ कहते हैं – मंदिर सबके लिए खुला होना चाहिए।
फिर क्यों 2026 में भी एक दलित युवक को “तुम अंदर कैसे घुसे” सुनना पड़ता है?
यह सवाल सिर्फ बांदा का नहीं, पूरे देश का है। वैकोम सत्याग्रह हो या कांचीपुरम, अंबेडकर का मंदिर प्रवेश आंदोलन हो या आज के गांव-गांव के छोटे-छोटे मंदिर – जंग अभी भी जारी है।
सिकहुला जैसी घटनाएं बताती हैं कि कानून कितना भी मजबूत हो, सामाजिक मानसिकता बदलना सबसे मुश्किल काम है।
सामाजिक प्रभाव: गांव में डर का माहौल, युवाओं में गुस्सा
सिकहुला जैसे छोटे गांव में ऐसी घटना पूरे समुदाय को हिला देती है। दलित परिवारों में अब मंदिर जाने का डर बढ़ गया होगा। महिलाएं और बच्चे और भी सतर्क हो जाएंगे।
दूसरी तरफ, जो लोग इस हमले में शामिल हैं, वे भी सोच रहे होंगे – क्या हम सही थे?
यह घटना युवा दलितों में शिक्षा, जागरूकता और संघर्ष की नई लहर पैदा कर सकती है। लेकिन साथ ही सामाजिक तनाव भी बढ़ा सकती है।
कानूनी विश्लेषण: SC/ST एक्ट की भूमिका और चुनौतियां
SC/ST एक्ट में FIR दर्ज होना अच्छी बात है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर देखा जाता है कि केस कमजोर पड़ जाते हैं। गवाह नहीं मिलते। दबाव बनाया जाता है।
बांदा पुलिस अगर पारदर्शी जांच करेगी और दोनों पक्षों को न्याय मिलेगा, तो यह एक मिसाल बनेगी। अन्यथा यह सिर्फ एक और फाइल बनकर रह जाएगा।
निष्कर्ष: मंदिर मां का घर है, किसी की जागीर नहीं
बांदा की यह घटना हमें फिर याद दिलाती है कि आजादी के 79 साल बाद भी हम पूर्ण समानता से बहुत दूर हैं।
छेदू की पीड़ा सिर्फ उसकी नहीं। यह हर उस दलित की पीड़ा है जो मंदिर के दरवाजे पर खड़ा होकर सोचता है – “क्या मैं अंदर जा सकता हूं?”
संविधान कहता है – हां, तुम जा सकते हो। समाज को अब यही कहना होगा।
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