
"भागीदारी नहीं तो वोट नहीं"। यह महज़ एक नारा नहीं था, बल्कि यह सदियों से हाशिए पर धकेले गए उस समाज की हुंकार थी, जिसने हमेशा दूसरों के लिए मिट्टी के बर्तन तो गढ़े, लेकिन सत्ता के प्याले में उसे कभी उसका जायज़ हिस्सा नहीं मिला।
जब हम उत्तर प्रदेश प्रजापति समाज राजनीति का विश्लेषण करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि यह लड़ाई केवल कुछ सीटों की नहीं है, बल्कि यह आत्मसम्मान, पहचान और व्यवस्था के खिलाफ अस्तित्व की लड़ाई है। आइए इस संघर्ष और समाज के प्रमुख राजनीतिक चेहरों के माध्यम से यूपी की राजनीति को समझें।
प्रजापति समाज का हाशिएकरण
प्रजापति समाज की स्थिति को तीन मुख्य बिंदुओं में देखा जा सकता है:
1. पहचान का संकट और आरक्षण का धोखा
उत्तर प्रदेश में प्रजापति (कुम्हार) समाज अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की अति-पिछड़ी (MBC) जातियों में आता है। विचारकों का मानना है कि पारंपरिक रूप से शोषित इस जाति को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा मिलना चाहिए, क्योंकि इनका सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न दलितों के समान ही हुआ है। बार-बार सरकारों ने इन्हें 17 अति-पिछड़ी जातियों के साथ SC में शामिल करने का झुनझुना थमाया, लेकिन कानूनी पचड़ों का बहाना बनाकर उन्हें उनके संवैधानिक हकों से वंचित रखा गया।
2. आनुपातिक प्रतिनिधित्व की कमी
राष्ट्रीय प्रजापति महासभा के अध्यक्ष दारा सिंह प्रजापति ने स्पष्ट मांग की थी कि देश भर में प्रजापति समाज की आबादी के अनुसार उन्हें 30 लोकसभा सीटें मिलनी चाहिए। लेकिन सत्ताधारी दल इस अति-पिछड़े समाज का इस्तेमाल सिर्फ रैलियों में भीड़ जुटाने और हिंदुत्व के नाम पर वोट लेने के लिए करते हैं, जबकि टिकट बंटवारे में सवर्ण जातियों का वर्चस्व कायम रहता है।
3. जल, जंगल और ज़मीन से बेदखली
कुम्हार समुदाय का सीधा नाता मिट्टी (ज़मीन) से रहा है। पूंजीवाद और भू-माफियाओं के कारण गांव के तालाब और ज़मीनें छिन गई हैं। बहुजन समाज की आर्थिक आत्मनिर्भरता को खत्म कर उन्हें मज़दूर बनने पर मजबूर किया गया है।
प्रतिनिधित्व बनाम छलावा
- दारा सिंह प्रजापति (बसपा): राष्ट्रीय प्रजापति महासभा के अध्यक्ष दारा सिंह प्रजापति ने समाज के हकों के लिए सड़क पर लंबी लड़ाई लड़ी है। उनके इसी संघर्ष को देखते हुए बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर से अपना प्रत्याशी बनाया। उन्होंने समाज को 'आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी' का नारा दिया।
- गायत्री प्रसाद प्रजापति और महराजी प्रजापति (सपा): समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति ने समाज को सत्ता के करीब पहुंचाया। वर्तमान में उनकी पत्नी महराजी प्रजापति अमेठी से समाजवादी पार्टी की विधायक हैं, जिन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की।
- ब्रजेश कुमार प्रजापति (सपा/पूर्व भाजपा): बांदा जिले की तिंदवारी सीट से 2017-2022 तक विधायक रहे ब्रजेश कुमार प्रजापति। उन्होंने 2022 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर लड़ा था।
- धर्मवीर प्रजापति (भाजपा): भारतीय जनता पार्टी ने पिछड़े वर्ग को साधने के लिए धर्मवीर प्रजापति को विधान परिषद सदस्य (MLC) बनाया और यूपी सरकार में औद्योगिक विकास एवं होमगार्ड विभाग का राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नियुक्त किया।
- मनोज प्रजापति (भाजपा): वर्तमान में हमीरपुर सदर सीट से भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं।
- राम प्रकाश प्रजापति (सपा): 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने इन्हें हमीरपुर से अपना प्रत्याशी बनाया था।
विश्लेषण: बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने जहां प्रजापति समाज को सीधे चुनाव लड़ने (MLA/MP) का मौका दिया है, वहीं भाजपा भी अपने तरीके से धर्मवीर प्रजापति जैसे नेताओं को मंत्री बनाकर इस वोट बैंक को सहेजने की कोशिश कर रही है। लेकिन विचारकों का मानना है कि यह केवल कुछ चेहरों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरी आबादी के अनुपात में सत्ता, प्रशासन और ठेकों में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।
बहुजन समाज की राजनीतिक शक्ति का बिखराव
प्रजापति समाज के पिछड़ेपन के पीछे सबसे बड़ा कारण वोट बैंक का बिखराव है। जब 'संकल्प यात्रा' पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया, तो समाजवादी पार्टी ने तुरंत इसे "पिछड़ा विरोधी भाजपा सरकार" का कृत्य बताकर इसकी निंदा की और कहा कि इस सरकार में दलितों और पिछड़ों के हक मारे जा रहे हैं। यह स्पष्ट करता है कि राजनीतिक दल इस समाज की पीड़ा को समझते हैं, लेकिन जब बहुजन समाज (SC/ST/OBC) धार्मिक आधार पर बंट जाता है, तो शासक वर्ग आसानी से उन पर शासन करता है। धर्म के नाम पर अति-पिछड़ों (MBCs) को सवर्ण नेतृत्व वाली पार्टियों का सिपाही बना दिया जाता है, जिससे उनकी स्वतंत्र बहुजन राजनीतिक पहचान खत्म हो जाती है।
बहुजन एकता और भविष्य की राह
2026 और 2027 के यूपी चुनावों में प्रजापति समाज को बहुजन परिप्रेक्ष्य से निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:
1. 'पीडीए' (PDA) और बहुजन गठजोड़: प्रजापति समाज को यह समझना होगा कि वे अकेले सत्ता परिवर्तन नहीं कर सकते। उन्हें दलितों, अल्पसंख्यकों और अन्य पिछड़ों (PDA) के साथ एक मजबूत बहुजन गठजोड़ बनाना होगा।
2. स्वतंत्र नेतृत्व का विकास: केवल रैलियों में झंडे उठाने के बजाय समाज को दारा सिंह प्रजापति, ब्रजेश प्रजापति या महराजी प्रजापति जैसे ज़मीनी नेताओं के पीछे लामबंद होना होगा, चाहे वे किसी भी दल में हों। दलों पर दबाव बनाना होगा कि वे "जनसंख्या के आधार पर टिकट" दें।
3. वैचारिक जागरूकता (Socio-Political Awakening): समाज के युवाओं को बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और पेरियार की विचारधारा को पढ़ना होगा। यह समझना होगा कि उनके आर्थिक संकट का हल 'माटी कला बोर्ड' जैसे छोटे झुनझुनों से नहीं, बल्कि संसद और विधानसभा में नीति-निर्माण की कुर्सी पर बैठने से निकलेगा।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश में प्रजापति समाज की राजनीतिक स्थिति एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। लंबे समय से उठते सवाल - क्या हमारी आबादी के अनुपात में हमें प्रतिनिधित्व मिल रहा है? अब खुलकर चर्चा का विषय बन रहे हैं।
2024 की “संकल्प यात्रा” ने यह संकेत दिया कि बहुजन और प्रजापति समाज के भीतर राजनीतिक जागरूकता बढ़ रही है। यह किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने अधिकारों, सम्मान और समान भागीदारी के लिए जागरूकता का प्रतीक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
2024 की 'संकल्प यात्रा' क्यों महत्वपूर्ण थी?
यह यात्रा राजनीतिक भागीदारी और आरक्षण के लिए निकाली गई थी, जिसे दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर पुलिस द्वारा बलपूर्वक रोक दिया गया और 217 लोगों पर दंगे का केस दर्ज किया गया। यह समाज के राजनीतिक जागरण का बड़ा प्रतीक है।
यूपी में प्रजापति समाज के प्रमुख विधायक और मंत्री कौन हैं?
वर्तमान में भाजपा से धर्मवीर प्रजापति (राज्य मंत्री, MLC)हमीरपुर से विधायक मनोज प्रजापति और सपा से अमेठी की विधायक महराजी प्रजापति प्रमुख नाम हैं।
चुनाव में अन्य दलों से प्रजापति समाज के कौन से बड़े चेहरे मैदान में रहे हैं?
तिंदवारी से पूर्व विधायक ब्रजेश कुमार प्रजापति (सपा) मुजफ्फरनगर से लोकसभा प्रत्याशी दारा सिंह प्रजापति (बसपा), और हमीरपुर से राम प्रकाश प्रजापति (सपा) समाज के प्रमुख राजनीतिक चेहरे रहे हैं।
