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| Image: Facebook. |
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी कानून-व्यवस्था और सख्त अनुशासन की बात आती है, तो बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो मायावती का नाम सबसे ऊपर आता है। एक बार फिर उन्होंने साबित कर दिया है कि पार्टी के उसूलों और 'क्लीन इमेज' से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। हाल ही में एक बड़ा बहुजन समाज पार्टी विवाद तब गहरा गया, जब यह बात सामने आई कि एक वरिष्ठ नेता ने गुपचुप तरीके से कुछ खूंखार अपराधियों को पार्टी में शामिल करा दिया है। इस धोखे के उजागर होते ही मायावती ने विक्रम सिंह को पार्टी से निकाला और पश्चिमी यूपी के संगठन में बड़े स्तर पर फेरबदल कर दिया है। यह मायावती की बड़ी कार्रवाई है, जिसने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है।
आखिर क्या है पूरा विवाद?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई मंडलों के कोऑर्डिनेटर रहे विक्रम सिंह पर गंभीर आरोप है कि उन्होंने 22 जनवरी को दो खतरनाक अपराधियों की मायावती से मुलाकात कराई। मायावती को उनके आपराधिक इतिहास के बारे में पूरी तरह अंधेरे में रखा गया और धोखे से उन्हें पार्टी की सदस्यता दिला दी गई। बताया जा रहा है कि ये दोनों अपराधी आगामी जिला पंचायत चुनाव में बसपा से टिकट पाना चाहते थे। जैसे ही जमीनी स्तर के नेताओं के जरिए यह बहुजन समाज पार्टी की खबर मायावती तक पहुंची, उन्होंने तुरंत कड़ा एक्शन लिया। यह BSP नेता पर कार्रवाई राजनीति में एक कड़ा संदेश है।
कौन हैं "वसीम मुन्ने" और "सुशील फौजी"?
जिन दो लोगों को बसपा में शामिल कराया गया था, उनका पुलिस रिकॉर्ड बेहद खौफनाक है।
- वसीम मुन्ने: मेरठ जिले के मुंडाली थाना क्षेत्र के साफियाबाद लोटी गांव का निवासी वसीम एक शातिर अपराधी है। उसके खिलाफ चोरी, लूट, डकैती, धोखाधड़ी और बलवा जैसे संगीन अपराधों के 56 मुकदमे दर्ज हैं। हैरानी की बात यह है कि वसीम पर पहला मुकदमा 2007 में तब दर्ज हुआ था, जब खुद मायावती यूपी की मुख्यमंत्री थीं।
- सुशील फौजी: रोहटा थाना क्षेत्र का निवासी सुशील फौजी पुलिस रिकॉर्ड में एक हिस्ट्रीशीटर और गैंगस्टर है। उस पर हत्या, बलवा और रंगदारी सहित 12 गंभीर मुकदमे दर्ज हैं। पुलिस के अनुसार, वह इलाके में दहशत फैलाने का काम करता है।
पुरानी गलतियों को दोहराना पड़ा भारी
यह पहली बार नहीं है जब विक्रम सिंह विवादों के घेरे में आए हों। लगभग चार साल पहले, मेरठ मंडल के कोऑर्डिनेटर रहते हुए उन्होंने मीनाक्षी सिंह नामक एक महिला को बसपा में शामिल कराया था। मीनाक्षी को दुष्कर्म के एक मामले में सह-आरोपी होने के कारण बीजेपी से निकाला गया था। उस वक्त भी मायावती ने विक्रम सिंह को कड़ी नसीहत देते हुए चेतावनी दी थी। लेकिन इस बार कुख्यात अपराधियों को बिना बताए पार्टी में लाने की गलती पर कोई रहम नहीं किया गया और विक्रम सिंह BSP से निष्कासित कर दिए गए।
'लॉ एंड ऑर्डर' और मायावती का 'ज़ीरो-टॉलरेंस' मॉडल
सामाजिक न्याय और संविधान के वैचारिक दृष्टिकोण से देखें, तो समाज की सुरक्षा हमेशा मायावती की राजनीति का केंद्र रही है। जब राजनीति में अपराधियों का बोलबाला होता है, तो उसका सबसे ज्यादा नुकसान शोषित वर्गों को ही उठाना पड़ता है।
मायावती हमेशा से कड़े फैसलों के लिए चर्चा में रहती है। बहुजन समाज पार्टी के भीतर यह कोई नई बात नहीं है; मायावती 'ज़ीरो-टॉलरेंस' नीति पर चलती हैं। 2007 से 2012 के अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान, उन्होंने अपने ही बाहुबली सांसद उमाकांत यादव को अपने आवास पर बुलाकर गिरफ्तार करवा दिया था। इसके अलावा, महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में उन्होंने अपने मंत्री आनंद सेन यादव, विधायक गुड्डू पंडित और शाहनवाज राणा जैसे रसूखदार नेताओं को तुरंत बर्खास्त कर जेल भेजा था।
हाल ही में चुनाव वाले राज्यों के लिए मायावती ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि 'क्लीन इमेज' वाले चेहरों को ही पार्टी मैदान में उतारेगी। उन्होंने साफ कहा था कि किसी भी उम्मीदवार की "जीतने की क्षमता" पार्टी की संवैधानिक प्रतिबद्धता से ऊपर नहीं हो सकती।
पश्चिमी यूपी के संगठन में बड़ा फेरबदल
BSP नेता को पार्टी से निकाला जाने के बाद, मायावती ने पश्चिमी यूपी में सांगठनिक स्तर पर भी बड़े बदलाव किए हैं। सूरज सिंह जाटव को आगरा और अलीगढ़ का नया कोऑर्डिनेटर बनाया गया है, जबकि जाफर मलिक को लखनऊ मंडल की जिम्मेदारी दी गई है। साथ ही, वरिष्ठ नेता मुनकाद अली का कद बढ़ाते हुए उन्हें मेरठ, मुरादाबाद और बरेली मंडलों का महत्वपूर्ण प्रभार सौंपा गया है। BSP में अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ यह फेरबदल दर्शाता है कि पार्टी जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
भविष्य पर असर और निष्कर्ष
मायावती का बड़ा फैसला सिर्फ एक नेता के निष्कासन तक सीमित नहीं है। यह बहुजन समाज और आम जनता के लिए एक मजबूत संदेश है कि बसपा चुनाव जीतने के लिए अपराधियों के आगे घुटने नहीं टेकेगी। आज के दौर में जहां कई राजनीतिक दल आपराधिक छवि वाले नेताओं को सिर आंखों पर बिठाते हैं, मायावती का यह कड़ा कदम बसपा को एक 'क्लीन गवर्नेंस' वाली पार्टी के रूप में एक नैतिक उच्चता (Moral High Ground) प्रदान करता है।
अंततः, राजनीति में 'अनुशासन' और 'सिद्धांत' कैसे कायम रखे जाते हैं, यह मायावती की इस कार्रवाई से समझा जा सकता है। अपराधियों को पिछले दरवाजे से राजनीति में लाने की कोई भी कोशिश बसपा में बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

