
आज भी जब हम शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की बात करते हैं, तो हमारे जेहन में सबसे पहला नाम इसी आयोग का आता है। लेकिन Mandal Commission ka sach आखिर है क्या? क्यों इसके लागू होने पर देश भर में भूचाल आ गया? आइए, हम भारत में सामाजिक न्याय की पृष्ठभूमि और OBC Reservation History (ओबीसी आरक्षण के इतिहास) को एक कहानी के रूप में समझते हैं।
सामाजिक न्याय की पृष्ठभूमि
भारत एक ऐसा देश है जहाँ सदियों से जाति व्यवस्था ने समाज को गहरे स्तर पर विभाजित किया है। स्वतंत्रता के बाद, संविधान निर्माताओं ने समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण का प्रावधान किया। लेकिन समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा था, जो न तो सवर्ण था और न ही दलित। यह वर्ग सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा हुआ था, जिसे बाद में 'अन्य पिछड़ा वर्ग' (OBC) कहा गया।
इस विशाल वर्ग की पहचान और उनके उत्थान के लिए 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में पहला पिछड़ा वर्ग आयोग बना, लेकिन उसकी सिफारिशों को कभी सही ढंग से लागू नहीं किया गया। इसके बाद, दशकों तक यह बड़ा तबका हाशिये पर रहा। फिर दौर आया 1970 के दशक के अंत का, जब एक नए आयोग की नींव रखी गई, जिसने भारतीय समाज और राजनीति की पूरी तस्वीर ही बदल दी।
मंडल आयोग क्या था? (What Is Mandal Commission)
भारत में पिछड़े वर्गों के लिए बने दूसरे आयोग को ही आम बोलचाल में 'मंडल आयोग' कहा जाता है। यदि आप सोच रहे हैं कि Mandal Commission kya hai, तो यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत बनाया गया एक विशेष आयोग था।
- स्थापना: 1 जनवरी 1979 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार ने इस आयोग का गठन किया था।
- उद्देश्य: इस आयोग का मुख्य उद्देश्य भारत में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) की पहचान करना और जातिगत असमानता एवं भेदभाव को दूर करने के लिए आरक्षण जैसे उपायों पर विचार करना था।
मंडल आयोग के अध्यक्ष कौन थे?
इस ऐतिहासिक आयोग की कमान बिंध्येश्वरी प्रसाद मंडल (B.P. Mandal) को सौंपी गई थी।
- बी.पी. मंडल का जन्म 25 अगस्त 1918 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था।
- वह मूल रूप से उत्तरी बिहार के मधेपुरा जिले के एक संपन्न यादव (ज़मींदार) परिवार से ताल्लुक रखते थे।
- एक अनुभवी राजनेता के रूप में, वे संसद सदस्य (सांसद) रहे और 1968 में 30 दिनों के लिए बिहार के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में भी कार्य किया।
- दलितों और पिछड़े वर्गों के प्रति उनके निरंतर समर्थन के कारण ही तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उन्हें इस 'नागरिक अधिकार आयोग' का अध्यक्ष चुना था।
मंडल आयोग की मुख्य सिफारिशें (Mandal Commission Report)
बी.पी. मंडल और उनकी टीम ने पूरे देश का व्यापक दौरा किया और 31 दिसंबर 1980 को अपनी ऐतिहासिक Mandal Commission report राष्ट्रपति को सौंप दी। इस रिपोर्ट में कुछ ऐसे आंकड़े और सुझाव थे, जिन्होंने सबको हैरान कर दिया:
OBC की पहचान और पिछड़ेपन के मानदंड
आयोग ने पिछड़ेपन को मापने के लिए एक बहुत ही वैज्ञानिक तरीका अपनाया और 11 मानदंड तय किए, जिन्हें सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक संकेतकों में बांटा गया था। इन मानदंडों के आधार पर पूरे देश में सर्वेक्षण किया गया।
52% आबादी और 27% आरक्षण
आयोग ने पाया कि 1931 की जनगणना के आधार पर देश की कुल आबादी का लगभग 52% हिस्सा 'अन्य पिछड़ा वर्ग' (OBC) का है।
- 27% आरक्षण की सिफारिश: सुप्रीम कोर्ट के 'एम.आर. बालाजी बनाम मैसूर राज्य' मामले के फैसले के अनुसार, कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता था। चूँकि SC/ST के लिए 22.5% आरक्षण पहले से लागू था, इसलिए मंडल आयोग ने OBC के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 27% आरक्षण की सिफारिश की।
- इसके अलावा, पदोन्नति (Promotions) में भी सभी स्तरों पर 27% आरक्षण की बात कही गई।
- आयु सीमा में SC/ST के समान ही छूट देने की वकालत की गई।
मंडल आयोग लागू कैसे हुआ (Mandal Commission 1990)
आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी, लेकिन अगले 10 सालों तक इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सरकारों ने इसे ठंडे बस्ते में डाल रखा। असली बदलाव का साल था 1990।
उस समय देश में वी.पी. सिंह (Vishwanath Pratap Singh) के नेतृत्व वाली 'राष्ट्रीय मोर्चा' की सरकार थी, जिसे वामपंथी दलों और भाजपा का बाहरी समर्थन प्राप्त था। राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, 7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने संसद के दोनों सदनों में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की ऐतिहासिक घोषणा कर दी। 13 अगस्त 1990 को इस संदर्भ में आधिकारिक ज्ञापन (Office Memorandum) भी जारी कर दिया गया, जिसमें सीधी भर्ती वाली सरकारी नौकरियों में OBC के लिए 27% आरक्षण का आदेश था।
विरोध और आंदोलन: जब देश सुलग उठा
मंडल आयोग के लागू होने की घोषणा होते ही उत्तर और पश्चिम भारत में भूचाल आ गया। सवर्ण (Upper caste) जातियों के युवाओं और छात्रों ने महसूस किया कि उनके रोजगार के अवसर छिन रहे हैं।
- सड़कों पर प्रदर्शन: जगह-जगह हड़ताल, चक्का जाम और हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए।
- आत्मदाह की घटनाएँ: 19 सितंबर 1990 को दिल्ली विश्वविद्यालय के 'देशबंधु कॉलेज' के छात्र राजीव गोस्वामी ने इस फैसले के विरोध में सरेआम आत्मदाह का प्रयास किया। इस घटना ने आग में घी का काम किया और पूरे उत्तर भारत के कई शहरों (जैसे हिसार, सिरसा, मेरठ, लखनऊ) में दर्जनों छात्रों ने आत्मदाह की कोशिश की। कई छात्रों की जान भी चली गई।
- दक्षिण भारत की प्रतिक्रिया: उत्तर भारत के विपरीत, दक्षिण भारत में इस रिपोर्ट का विरोध नाममात्र का हुआ। इसका कारण यह था कि वहाँ पहले से ही 50% के करीब आरक्षण लागू था और वहाँ निजी औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार के अच्छे अवसर मौजूद थे।
बहुजन समाज और राजनीति पर मंडल आयोग का प्रभाव
मंडल आयोग केवल नौकरियों तक सीमित नहीं था; इसने भारत की सामाजिक और राजनीतिक संरचना की नींव हिला दी। OBC reservation history में यह सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ:
- सरकारी नौकरियों और शिक्षा में प्रतिनिधित्व: सरकारी तंत्र में सदियों से हाशिये पर रहे बहुजन समाज को पहली बार सत्ता और प्रशासन में सीधी हिस्सेदारी मिली। शिक्षा के क्षेत्र में भी OBC वर्ग के छात्रों के लिए दरवाजे खुले, जिससे एक नया 'शिक्षित मध्यम वर्ग' तैयार हुआ।
- राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव: इस आंदोलन ने पिछड़ी जातियों में भारी राजनीतिक चेतना जगाई। उत्तर प्रदेश और बिहार में मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं और कई क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ, जिन्होंने सीधे तौर पर OBC पहचान की राजनीति की।
मंडल आयोग और डॉ. आंबेडकर के सामाजिक न्याय के विचार
भारत में सामाजिक न्याय की नींव डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने रखी थी। वी.पी. सिंह ने जब 9 अगस्त 1990 को राज्यसभा में मंडल आयोग को लागू करने की बात की, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था, "यह भारत रत्न डॉ. बी.आर. आंबेडकर, महान पेरियार रामासामी और डॉ. राम मनोहर लोहिया के सपनों को साकार करने जैसा है"।
मंडल आयोग की मूल भावना डॉ. आंबेडकर के उसी विचार से प्रेरित थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि जब तक समाज में सामाजिक और आर्थिक समानता नहीं आएगी, तब तक केवल राजनीतिक समानता (वोट का अधिकार) बेमानी है। मंडल आयोग ने उसी सामाजिक बराबरी को स्थापित करने का ठोस प्रयास किया।
आज के भारत में मंडल आयोग की प्रासंगिकता
तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी Mandal Commission और इसकी प्रासंगिकता कम नहीं हुई है, बल्कि इसके सामने नई चुनौतियाँ आ खड़ी हुई हैं।
- क्रीमी लेयर (Creamy Layer) का मुद्दा: 1992 के ऐतिहासिक 'इंद्रा साहनी (Indra Sawhney) बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 27% आरक्षण को तो सही ठहराया, लेकिन 'क्रीमी लेयर' (OBC वर्ग के संपन्न लोग) को इस लाभ से बाहर रखने का निर्देश दिया। आज भी क्रीमी लेयर की आय सीमा को लेकर अक्सर बहस होती रहती है।
- उप-वर्गीकरण (Sub-categorization): अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि OBC कोटे के भीतर एक और वर्गीकरण होना चाहिए, ताकि आरक्षण का लाभ उन अति-पिछड़ी जातियों तक भी पहुंचे जो अभी तक मुख्यधारा में नहीं आ सकी हैं।
- निजी क्षेत्र में आरक्षण: चूँकि अब सरकारी नौकरियाँ कम हो रही हैं और प्राइवेट सेक्टर बड़ा नियोक्ता बन गया है, इसलिए निजी क्षेत्र में भी मंडल आयोग की तर्ज पर आरक्षण लागू करने की बहस छिड़ी हुई है।
मंडल आयोग का असली महत्व
Mandal Commission सिर्फ 27 प्रतिशत आरक्षण का आंकड़ा नहीं है। यह भारत के उस विशाल तबके को मुख्यधारा में लाने का एक साहसिक और ऐतिहासिक कदम था, जिसे सदियों से विकास और सत्ता की परिधि से बाहर रखा गया था।
हालाँकि इस आयोग ने भारतीय समाज को जाति के आधार पर ध्रुवीकृत भी किया, लेकिन यह भी एक निर्विवाद सत्य है कि मंडल आयोग के बिना भारतीय लोकतंत्र वास्तव में कभी समावेशी (Inclusive) नहीं बन पाता। इसने पिछड़े वर्गों को यह अहसास दिलाया कि इस देश की सत्ता, प्रशासन और संपदा में उनका भी बराबर का हक है। आज के भारत का राजनीतिक और सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह से मंडल आयोग द्वारा खींची गई लकीरों पर ही टिका हुआ है।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Mandal Commission क्या है?
मंडल आयोग (दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग) भारत सरकार द्वारा 1979 में स्थापित एक आयोग था। इसका उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) की पहचान करना और उनके लिए सरकारी नौकरियों व शिक्षा में आरक्षण की सिफारिश करना था।
मंडल आयोग के अध्यक्ष कौन थे?
इस आयोग के अध्यक्ष बी.पी. मंडल (बिंध्येश्वरी प्रसाद मंडल) थे। वे एक सांसद और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके थे।
मंडल आयोग ने कितने प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की थी?
आयोग ने ओबीसी (OBC) वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 27% आरक्षण की सिफारिश की थी।
