
सियासत का पहिया भी कितना अजीब है। जो राजनैतिक दल कभी एक-दूसरे के धुर विरोधी हुआ करते थे, आज वे एक ही महापुरुष की विरासत पर अपना दावा ठोकने के लिए बेताब हैं। बात हो रही है उत्तर प्रदेश की राजनीति की और केंद्र में हैं बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक मान्यवर कांशीराम।
जैसे-जैसे यूपी विधानसभा चुनाव 2027 करीब आ रहे हैं, सत्ता के गलियारों में हलचल तेज हो गई है। आगामी कांशीराम जयंती 2026 को लेकर अभी से सपा, भाजपा और कांग्रेस ने जो बिसात बिछानी शुरू कर दी है, वह यह बताने के लिए काफी है कि यूपी में दलित वोट बैंक की अहमियत क्या है। एक दौर था जब कांशीराम एक फटे हुए रबर टायर की चप्पल पहनकर, अपनी पुरानी साइकिल पर नीले रंग का झंडा बांधकर गाँव-गाँव घूमा करते थे। तब किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन भारत की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां उनके नाम पर वोट मांगेंगी।
आइए, इस कहानी की परतों को थोड़ा गहराई से खोलते हैं और समझते हैं कि आख़िर ऐसा क्या बदल गया है कि 2027 से पहले सबको कांशीराम याद आने लगे हैं।
खिसकता वोट बैंक: क्यों मची है दलित वोटों की लूट?
इस पूरी राजनैतिक उठापटक की पटकथा पिछले एक दशक के चुनावी नतीजों में छुपी है। किसी समय में उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (BSP) का एकछत्र राज हुआ करता था। 2007 के विधानसभा चुनावों में जब मायावती ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, तब पार्टी का वोट शेयर अपने उच्चतम स्तर 30.43% पर था। लेकिन इसके बाद से पार्टी का ग्राफ़ लगातार नीचे गिरा है।
2022 के विधानसभा चुनावों में यह वोट शेयर गिरकर महज़ 12.88% रह गया। सबसे बड़ा झटका 2024 के लोकसभा चुनावों में लगा, जब बसपा का वोट शेयर खिसककर 9.39% पर आ गया और पार्टी उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से एक भी सीट नहीं जीत सकी।
मायावती के बार-बार बदलते फ़ैसलों, जैसे अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से निष्कासित करना (और फिर वापस लेना), और उनकी ज़मीनी राजनीति से दूरी ने दलित समाज के भीतर एक खालीपन पैदा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब यूपी का लगभग 21% दलित वोट बैंक, जिसमें गैर-जाटव और जाटव दोनों शामिल है। और इसी बिखरे हुए वोट बैंक को समेटने के लिए सपा, भाजपा और कांग्रेस मान्यवर कांशीराम की शरण में पहुँच गए हैं।
समाजवादी पार्टी का 'PDA' दांव और 1993 की यादें
इस होड़ में सबसे आक्रामक तरीके से अगर कोई पार्टी आगे आई है, तो वह है अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी (SP)। सपा ने आगामी कांशीराम जयंती 2026 और उससे पहले के आयोजनों को 'PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) दिवस' के रूप में मनाने का बड़ा फ़ैसला किया है।
यह सिर्फ एक जयंती मनाने का मामला नहीं है, बल्कि यह 1990 के दशक की उस पुरानी याद को ताज़ा करने की कोशिश है, जब कांशीराम और मुलायम सिंह यादव ने मिलकर एक अजेय सामाजिक गठबंधन तैयार किया था। 1993 में जब “मिले मुलायम-कांशीराम...” का नारा गूंजा था, तब इसने यूपी की राजनीति में उच्च जातियों के वर्चस्व को हिला कर रख दिया था और कांशीराम के समर्थन से मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने थे।
अखिलेश यादव अब उसी 'कांशीराम फॉर्मूले' को अपनाकर दलितों को यह संदेश देना चाहते हैं कि उनके अधिकारों की असली लड़ाई अब समाजवादी पार्टी ही लड़ सकती है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि कांशीराम किसी एक पार्टी के नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक न्याय के पुरोधा हैं और बसपा ने अब वह रास्ता छोड़ दिया है।
मायावती का पलटवार: 1995 का गेस्ट हाउस कांड
समाजवादी पार्टी के इस दांव ने बसपा सुप्रीमो मायावती को बेहद आहत और क्रोधित कर दिया है। उन्होंने सपा की इस कोशिश को "विशुद्ध राजनीतिक नौटंकी" करार दिया है।
मायावती ने दलितों को सपा के इतिहास की याद दिलाते हुए 2 जून 1995 के कुख्यात 'लखनऊ गेस्ट हाउस कांड' का जिक्र किया, जब सपा कार्यकर्ताओं ने उन पर जानलेवा हमला किया था। मायावती का तर्क है कि जो सपा हमेशा से 'दलित-विरोधी' और 'बसपा-विरोधी' रही है, जिसने सत्ता में रहते हुए कांशीराम के नाम पर बने जिलों और विश्वविद्यालयों के नाम बदल दिए, वह आज किस मुँह से उनकी जयंती मना रही है।
यह एक सीधा संदेश है अपने कोर जाटव वोट बैंक को, कि वे समाजवादी पार्टी के लोकलुभावन दावों में न फँसें।
भाजपा की 'साइलेंट' इंजीनियरिंग
दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी (BJP) बहुत ही खामोशी लेकिन बारीकी से अपना काम कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों में दलित वोटों के खिसकने से भाजपा आलाकमान सतर्क हो गया है। भाजपा का 'मिशन 2027' दलित बस्तियों तक सीधी पहुँच बनाने पर केंद्रित है।
पार्टी ने एक वार्षिक कैलेंडर तैयार किया है, जिसके तहत डॉ. बी.आर. आंबेडकर, संत रविदास और ज्योतिबा फुले जैसे महापुरुषों के साथ-साथ कांशीराम से जुड़े कार्यक्रमों को भी बूथ स्तर पर मनाया जाएगा।
भाजपा की रणनीति की सबसे खास बात यह है कि पार्टी नेताओं को मायावती पर सीधा हमला करने से बचने के निर्देश दिए गए हैं। भाजपा नहीं चाहती कि मायावती पर हमले से दलितों के बीच उनके लिए कोई 'सहानुभूति की लहर (Sympathy wave)' पैदा हो। भाजपा का पूरा जोर सरकारी योजनाओं के दलित लाभार्थियों से सीधा संवाद कर उन्हें अपने पाले में जोड़े रखने पर है।
कांग्रेस की उम्मीदें और चंद्रशेखर आज़ाद का उभार
कांग्रेस भी इस मौके को भुनाने में पीछे नहीं है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार 'संविधान बचाओ' का नैरेटिव गढ़ रही है, जिसने 2024 में उसे गैर-जाटव दलितों का बड़ा समर्थन दिलाया। कांग्रेस नेता भी कांशीराम के संघर्षों को याद करते हुए दलित बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच पैठ बना रहे हैं।
इन सबके बीच, चंद्रशेखर आज़ाद की आज़ाद समाज पार्टी का उभार भी एक नया कोण है। एक युवा और आक्रामक दलित नेता के रूप में चंद्रशेखर नगीना से सांसद बन चुके हैं। हालाँकि उनके पास अभी बसपा जैसा मजबूत कैडर और संसाधन नहीं हैं, लेकिन वे उस युवा दलित वर्ग की आवाज़ बन रहे हैं जो बसपा की वर्तमान निष्क्रियता से निराश है।
आख़िर कौन थे कांशीराम?
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2027 का रास्ता कांशीराम के उसूलों से होकर गुज़रेगा
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक चौराहे पर खड़ी है। 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह इस बात का भी लिटमस टेस्ट होगा कि उत्तर प्रदेश का 21% दलित समुदाय अब किस पर भरोसा करता है।
चाहे समाजवादी पार्टी का 'PDA' मॉडल हो, भाजपा का 'सबका साथ-सबका विकास' या कांग्रेस का 'संविधान बचाओ' अभियान—सभी को यह भली-भांति पता है कि बिना कांशीराम के विचारधारा को नमन किए वे बहुजन समाज के दिल में नहीं उतर सकते। आगामी कांशीराम जयंती 2026 इस राजनैतिक लड़ाई का एक बहुत बड़ा मंच साबित होने वाली है।
लेकिन बहुजन समाज आज पहले से कहीं अधिक जागरूक है। वह महज़ मूर्तियाँ लगाने या जयंतियाँ मनाने से खुश होने वाला नहीं है। वह अब सत्ता में अपनी वास्तविक भागीदारी खोज रहा है, क्योंकि कांशीराम ने उन्हें यही सिखाया था। देखना दिलचस्प होगा कि 2027 में यह Master Key किस पार्टी के हाथ लगती है।
