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26 फरवरी 2026। लखनऊ। बसपा अध्यक्ष मायावती के एक पोस्ट ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में तूफान खड़ा कर दिया। समाजवादी पार्टी ने बसपा संस्थापक कांशीराम जी की जयंती (15 मार्च) को ‘पीडीए दिवस’ मनाने का ऐलान किया। मायावती ने इसे ‘विशुद्ध राजनीतिक नौटंकीबाजी’ और ‘वोट का छलावा’ बता दिया।
एक तरफ वह नेता जिसने बहुजन समाज को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाया, दूसरी तरफ वह पार्टी जो कभी गठबंधन करती थी, फिर गद्दारी। आज जब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी चल रही है, तो यह टकराव सिर्फ दो नेताओं का नहीं – यह लाखों दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यक वोटरों के भविष्य का सवाल है।
कांशीराम जी कौन थे? बहुजन आंदोलन की असली मशाल
15 मार्च 1934 को पंजाब के एक छोटे से गांव में जन्मे कांशीराम जी ने जिंदगी भर ‘पे बैक टू सोसाइटी’ का नारा दिया। सरकारी नौकरी छोड़कर उन्होंने BAMCEF, DS-4 और फिर 1984 में बहुजन समाज पार्टी की नींव रखी। उनका सपना था – 85% बहुजन समाज को राजनीतिक सत्ता दिलाना।
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डॉ. आंबेडकर के संविधान को हथियार बनाकर उन्होंने कहा – “राजनीति सत्ता के लिए होती है।” 1993 में मुलायम सिंह यादव की सरकार बनाने में मदद की, लेकिन 1995 के गेस्ट हाउस कांड में खुद पर जानलेवा हमला झेला। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। 2007 में ‘सरवजन समीकरण’ से यूपी की सत्ता हासिल की। आज भी उनके स्मारक लखनऊ में गवाह हैं – बहुजन गौरव के।
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सपा का ऐलान: पीडीए दिवस या वोटबैंक की चाल?
अखिलेश यादव ने सभी जिलों के पदाधिकारियों को पत्र लिखा। कहा – कांशीराम जी ने मंडल आयोग का समर्थन किया, मुलायम जी के साथ समझौता कर बहुजन को जोड़ा। 15 मार्च को हर जिले में श्रद्धांजलि सभाएं होंगी।
2024 लोकसभा में PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला काम कर गया। सपा ने 37 सीटें जीतीं। अब 2027 में भी यही हथियार। लेकिन मायावती कहती हैं – “जब सपा सत्ता में थी तो न PDA याद आया, न कांशीराम जी के नाम पर बने स्कूल-हॉस्पिटल-यूनिवर्सिटी।”
मायावती का पलटवार: नाम बदलने से लेकर गेस्ट हाउस तक
मायावती ने एक्स पर लंबा पोस्ट लिखा। मुख्य आरोप:
- कासगंज को कांशीराम नगर बनाया, सपा ने नाम बदल दिया।
- भदोही को संत रविदास नगर बनाया, सपा ने बदल डाला।
- लखनऊ में कांशीराम उर्दू-फारसी यूनिवर्सिटी, सपा ने ‘लैंग्वेज यूनिवर्सिटी’ कर दिया (भाजपा अब भी यही नाम इस्तेमाल करती है)।
- सहारनपुर में कांशीराम अस्पताल का नाम बदल दिया।
कांशीराम जी का निधन सपा शासन में हुआ। एक दिन का राजकीय शोक तक नहीं घोषित किया गया।
1995 का गेस्ट हाउस कांड – मुलायम सिंह यादव की सरकार में मायावती पर हमला। मायावती ने याद दिलाया – “सपा-बसपा गठबंधन टूटा तो दलित विरोधी चेहरा सामने आया।”
2013 मुजफ्फरनगर दंगे – सपा शासन में, भाजपा को फायदा। मायावती का कहना – “सपा के भड़काऊ आचरण से भाजपा को रोटी सेंकने का मौका मिला।”
दलित-ओबीसी राजनीति का गहरा घाव
उत्तर प्रदेश में दलित वोटर करीब 21%, ओबीसी 40% से ज्यादा। 2024 में सपा ने गैर-यादव ओबीसी और जाटव दलितों को टिकट दिए। बसपा के कई पुराने नेता सपा में शामिल हो गए। मायावती का सवाल जायज – क्या वोट के लिए कांशीराम जी का नाम इस्तेमाल करना सही है?
संविधान, सामाजिक न्याय और असली विरासत
डॉ. आंबेडकर ने कहा था – “शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित हो।” कांशीराम जी ने इसे राजनीतिक हथियार बनाया। बसपा की सरकारों में दलितों को सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व बढ़ा, पार्क बनाए, सम्मान दिया।
दूसरी तरफ सपा शासन में कई बार बहुजन संतों-गुरुओं का अपमान हुआ। मुस्लिम समाज भी सपा के समय दंगों का शिकार रहा। आज भाजपा के राज में भी बहुजन पीड़ित हैं, लेकिन मायावती कहती हैं – “सपा और भाजपा दोनों एक जैसे।”
2027 चुनाव पर क्या असर पड़ेगा?
अभी BSP कमजोर नजर आ रही है, लेकिन मायावती की रैलियां फिर से भीड़ खींच रही हैं। सपा PDA को और मजबूत कर रही है – I-PAC जैसी एजेंसी से कैंपेन प्लानिंग। भाजपा ब्राह्मण-ओबीसी को साधने में लगी है।
निष्कर्ष: वोट की नौटंकी या असली सेवा?
मायावती का हमला सिर्फ सपा पर नहीं – पूरे सिस्टम पर है जो बहुजन को बांटता है। कांशीराम जी की जयंती पर अगर सच्ची श्रद्धांजलि देनी है तो उनके सपने को पूरा करो – शिक्षा, रोजगार, इज्जत। न कि सिर्फ ‘दिवस’ मनाकर फोटो खिंचवाओ।
बहुजन समाज आज सजग है। 2027 में फैसला वह करेगा जो असली सेवा करेगा, न कि नाटक।
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