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| Image: Dainik Bhaskar. |
बुलंदशहर। 25 फरवरी, बुधवार की दोपहर, जिला कार्यालय के हॉल में सैकड़ों आंखें एक ही दिशा में टिकी थीं। हवा में बसपा के नीले झंडे लहरा रहे थे। और मंच पर जिलाध्यक्ष रविंद्र प्रधान का आवाज़ गूंज रहा था – “पार्टी की नीतियां और विचारधारा हर आम आदमी तक पहुंचाना ही हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य है।”
यह कोई साधारण बैठक नहीं थी। यह बहुजन समाज के उन लाखों सपनों को फिर से जीवंत करने की कोशिश थी, जो सालों से दबाए जा रहे हैं।
बैठक का मकसद: बूथ स्तर पर लोहे जैसी मजबूती
रविंद्र प्रधान ने साफ कहा – अब समय है संगठन को जमीनी स्तर पर खड़ा करने का। हर बूथ पर कार्यकर्ता सक्रिय हों। गांव-गांव जाकर लोगों से बात करें। पार्टी की योजनाएं बताएं। और सबसे जरूरी – सामाजिक न्याय और समानता का संदेश दें।
बैठक में फैसला लिया गया कि सदस्यता अभियान तेज किया जाएगा। आने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की गई। और सबसे बड़ा ऐलान – पूर्व लोकसभा प्रत्याशी नाज मोहम्मद खान को जिला उपाध्यक्ष बनाया गया।
यह नियुक्ति सिर्फ एक नाम की नहीं, बल्कि एक संदेश की थी। अल्पसंख्यक समाज को बसपा के साथ जोड़ने का स्पष्ट संकेत।
कार्यकर्ता क्यों उत्साहित हैं?
अनिल शर्मा उर्फ लाला प्रधान और प्यारेलाल जाटव जैसे पुराने कार्यकर्ता लंबे समय बाद इस जोश को महसूस कर रहे थे। एक कार्यकर्ता ने कहा, “बहन जी का मिशन कभी खत्म नहीं होता। हम बस फिर से मैदान में उतर रहे हैं।”
रविंद्र प्रधान ने कार्यकर्ताओं से सीधा आह्वान किया – “हर गांव में जाओ, हर परिवार से मिलो। बताओ कि बसपा हमेशा कमजोर वर्गों के लिए लड़ी है और आगे भी लड़ती रहेगी।”
सामाजिक न्याय की लड़ाई: अम्बेडकर का सपना, बहन जी का संकल्प
बसपा की विचारधारा का केंद्र बिंदु हमेशा से यही रहा – जो समाज सबसे ज्यादा शोषित है, उसी को मुख्यधारा में लाना। डॉ. भीमराव अम्बेडकर का संविधान हमें समानता देता है, लेकिन हकीकत में अभी भी जाति, गरीबी और भेदभाव की दीवारें खड़ी हैं।
इस बैठक में बार-बार दोहराया गया – बसपा सिर्फ चुनावी पार्टी नहीं, बल्कि एक आंदोलन है। कमजोर तबके के अधिकारों की लड़ाई में कोई समझौता नहीं।
2027 के चुनाव की रणनीति की झलक
यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन तैयारी शुरू हो चुकी है। मायावती जी बार-बार कह रही हैं – “कोई गठबंधन नहीं, बसपा अकेले लड़ेगी।”
बुलंदशहर की यह बैठक उसी बड़े प्लान का छोटा हिस्सा है। बूथ स्तर पर मजबूत संगठन, सक्रिय कार्यकर्ता और जनता तक सीधा संपर्क – यही 2007 की सफलता का फॉर्मूला था।
क्या 2027 में फिर वही जादू दोहराया जाएगा? इस बैठक से लगता है कि बसपा इस बार बिना किसी समझौते के मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है।
स्थानीय स्तर पर क्या बदलेगा?
बुलंदशहर हमेशा से बसपा का मजबूत गढ़ रहा है। यहां के कार्यकर्ता जानते हैं कि अगर बूथ पर संगठन मजबूत हुआ तो विधानसभा सीटों पर असर सीधा पड़ेगा।
नाज मोहम्मद खान जैसे चेहरों की नियुक्ति से मुस्लिम-बहुजन गठजोड़ की पुरानी ताकत लौटने के संकेत मिल रहे हैं। साथ ही ब्राह्मण समाज को भी साथ लाने की कोशिशें चल रही हैं – ठीक 2007 की तरह।
भविष्य पर असर: एक नई शुरुआत?
यह बैठक सिर्फ बुलंदशहर तक सीमित नहीं। पूरे उत्तर प्रदेश में ऐसी सैकड़ों बैठकें हो रही हैं। मायावती जी की रणनीति साफ है – जमीनी स्तर से शुरू करो, धीरे-धीरे पूरे राज्य को तैयार करो।
अगर कार्यकर्ता इस अपील को अमल में लाए तो न सिर्फ बसपा का वोट बैंक मजबूत होगा, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों में राजनीतिक जागरूकता भी बढ़ेगी। शिक्षा, रोजगार, न्याय – इन मुद्दों पर जनता की आवाज और तेज होगी।
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निष्कर्ष: बहुजन एक हो, तो असंभव कुछ नहीं
बुलंदशहर की इस बैठक ने एक बात साबित कर दी – बसपा अभी भी जिंदा है। कार्यकर्ताओं का जोश, नेतृत्व का संकल्प और मिशन की स्पष्टता – ये तीनों मिलकर एक तूफान पैदा कर सकते हैं।
बहन कुमारी मायावती का सपना था – “सबका साथ, सबका विकास, लेकिन सबसे पहले बहुजन।” आज बुलंदशहर के कार्यकर्ता उसी सपने को आगे बढ़ा रहे हैं।

