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| Image: Artistic political Editorial. |
लखनऊ(उ.प्र.): कल्पना कीजिए, उत्तर प्रदेश की धरती पर एक ऐसा आंदोलन जो दशकों से दबे-कुचले समाज को आवाज देता रहा है। कांशी राम, जिन्होंने बसपा की नींव रखी और दलितों को राजनीतिक ताकत दी, उनकी जयंती अब एक नई सियासी जंग का मैदान बन गई है। अखिलेश यादव का 'मिशन कांशी राम' क्या सिर्फ चुनावी चाल है या बहुजन समाज के लिए असली उम्मीद? मायावती की नाराजगी से यह साफ है कि विरासत की लड़ाई शुरू हो चुकी है। क्या यह 2027 के चुनावों में बड़ा उलटफेर लाएगा? आइए, गहराई से समझते हैं।
कांशी राम की विरासत: अखिलेश की नई रणनीति
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांशी राम का नाम सम्मान और संघर्ष का प्रतीक है। उन्होंने 1984 में बसपा की स्थापना की और दलित, पिछड़े व अल्पसंख्यकों को एकजुट करने का सपना देखा। आज, समाजवादी पार्टी (SP) प्रमुख अखिलेश यादव ने उनकी 91वीं जयंती को 'पीडीए दिवस' के रूप में मनाने का ऐलान किया है। यह 'मिशन कांशी राम' का हिस्सा है, जहां SP हर जिले में कार्यक्रम आयोजित करेगी।
अखिलेश का मकसद साफ है: यादव-मुस्लिम आधार को मजबूत रखते हुए दलित वोटों को जोड़ना। 2024 के लोकसभा चुनावों में PDA फॉर्मूला ने SP को 37 सीटें दिलाईं, जो BJP को चुनौती देने में कामयाब रहा। अब, 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले यह कदम दलित समाज में विश्वास जगाने की कोशिश है। लेकिन क्या यह इतना आसान है?
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PDA फॉर्मूला क्या है और क्यों महत्वपूर्ण?
PDA का मतलब है पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। अखिलेश ने इसे SP की मुख्य रणनीति बनाया है, जो राम मनोहर लोहिया की समाजवादी विचारधारा को बाबासाहेब अंबेडकर और कांशी राम की दलित चेतना से जोड़ती है। इस फॉर्मूले ने 2024 में दलित वोटों का एक हिस्सा SP की ओर खींचा, जहां बसपा का प्रदर्शन खराब रहा।
कांशी राम की जयंती को पीडीए दिवस बनाने से SP गांव-गांव में पहुंच बनाना चाहती है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल ने निर्देश जारी किए कि हर जिले में सभाएं हों, जहां बहुजन समाज की एकता पर जोर दिया जाए। यह सिर्फ जयंती नहीं, बल्कि एक राजनीतिक अभियान है जो दलितों को बताता है कि SP उनकी लड़ाई लड़ रही है।
मायावती की नाराजगी: नाटकबाजी या असली खतरा?
बसपा सुप्रीमो मायावती ने 'मिशन कांशी राम' को 'घोर अवसरवाद' करार दिया है। उन्होंने कहा कि SP का चरित्र हमेशा दलित-विरोधी रहा है। मायावती को याद है कि अखिलेश की सरकार ने कांशी राम के नाम पर बने जिले का नाम बदल दिया था। बसपा प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने PDA को 'परिवार दल अलायंस' कहकर तंज कसा, आरोप लगाया कि यह अखिलेश के परिवार की एकता के लिए है।
मायावती की खफा होना स्वाभाविक है। कांशी राम उनकी राजनीतिक बैकबोन थे, जिनके सहारे वह चार बार CM बनीं। अब SP कई पूर्व बसपा नेताओं जैसे इंद्रजीत सरोज, रामअचल राजभर और लालजी वर्मा को शामिल कर चुकी है। यह बसपा के कोर वोटबैंक पर सीधा हमला है। मायावती ने SP और BJP को एक-दूसरे का पूरक बताया, कहते हुए कि दोनों दलित-विरोधी हैं।
इतिहास की झलक: SP-BSP का प्यार और जुदाई
SP और बसपा का रिश्ता उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 1993 में गठबंधन बना, लेकिन 1995 के गेस्टहाउस कांड ने इसे तोड़ दिया। 2019 में फिर साथ आए, लेकिन चुनाव बाद अलग हो गए। अखिलेश ने 2022 के बाद से बसपा के नेताओं को जोड़ना शुरू किया, जैसे रायबरेली में कांशी राम की मूर्ति का अनावरण।
कांशी राम का SP से पुराना कनेक्शन है। 1991 में उन्होंने इटावा से लोकसभा चुनाव जीता था, जो यादव परिवार का गढ़ है। लेकिन अब यह विरासत की जंग है, जहां अखिलेश कांशी राम को अपनाकर दलितों को संदेश दे रहे हैं कि SP बहुजन समाज की असली वारिस है।
दलितों के लिए क्या मतलब?
यह सिर्फ चुनावी खेल नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की बड़ी तस्वीर है। कांशी राम ने DS-4 (दलित, शोषित, समाज संगठन) से शुरू कर बहुजन समाज को राजनीतिक ताकत दी। उनके आंदोलन ने दलितों में चेतना जगाई, जो संविधान की भावना से जुड़ा है – समानता और न्याय।
अखिलेश का मिशन दलितों को एकजुट करने का प्रयास है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह वोटबैंक राजनीति है। उत्तर प्रदेश में 20% दलित आबादी है, जो चुनावों का फैसला करती है। अगर SP इन्हें जोड़ लेती है, तो बहुजन समाज में नई एकता आ सकती है। लेकिन क्या यह असली सामाजिक बदलाव लाएगा? या सिर्फ सत्ता की कुर्सी के लिए?
संविधान और बहुजन समाज की वैचारिक गहराई
बाबासाहेब अंबेडकर के संविधान ने दलितों को अधिकार दिए, लेकिन कांशी राम ने इन्हें राजनीतिक हथियार बनाया। उनके '85% बनाम 15%' के सिद्धांत ने बहुमत को जगाया। अखिलेश की PDA रणनीति इसी पर आधारित है, जो पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एक मंच देती है।
यह शिक्षा और रोजगार से जुड़ा है। दलित समाज में शिक्षा की कमी और सामाजिक भेदभाव अभी भी समस्या है। अगर SP की यह कवायद सफल होती है, तो बहुजन समाज में नई जागृति आ सकती है, जहां संविधान की भावना साकार हो। लेकिन मायावती की चेतावनी है कि ऐसे नाटक दलितों को धोखा देते हैं।
2027 चुनावों पर नजर
2027 के UP चुनावों में 'मिशन कांशी राम' बड़ा फैक्टर हो सकता है। SP का लक्ष्य 50% वोट शेयर है, जो BJP को टक्कर दे सके। 2024 में दलित वोटों का झुकाव SP की ओर हुआ, जिससे बसपा का ग्राफ गिरा। अगर यह जारी रहा, तो बसपा कमजोर हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषक सिद्धार्थ कलहंस मानते हैं कि अखिलेश दलितों से भावनात्मक रिश्ता जोड़ रहे हैं। लेकिन BJP भी ब्राह्मण और अन्य जातियों को साध रही है। यह शह-मात का खेल है, जहां सामाजिक न्याय चुनावी हथियार बन गया है। क्या SP सफल होगी? या मायावती बसपा को पुनर्जीवित कर पाएंगी?
चुनौतियां और संभावनाएं
SP के लिए चुनौती है विश्वास जीतना। दलित समाज मायावती को 'बहन जी' मानता है, लेकिन बसपा की कमजोरी से असंतोष है। अगर अखिलेश शिक्षा, आरक्षण और सामाजिक सुरक्षा पर फोकस करें, तो बदलाव आ सकता है। लेकिन अगर यह सिर्फ चुनावी स्टंट रहा, तो उलटा असर हो सकता है।
भविष्य में, यह बहुजन राजनीति को मजबूत कर सकता है, जहां संविधान की रक्षा और सामाजिक समानता मुख्य मुद्दा बने।
विरासत की जंग में जीतेगा कौन?
'मिशन कांशी राम' उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया अध्याय लिख रहा है। अखिलेश की यह रणनीति दलितों को उम्मीद देती है, लेकिन मायावती की नाराजगी सवाल उठाती है। सामाजिक न्याय की लड़ाई में यह कदम भावनात्मक है, लेकिन तथ्यों से पता चलता है कि वोटबैंक की जंग तेज हो गई है। क्या यह बहुजन समाज को एकजुट करेगा या बांटेगा? समय बताएगा, लेकिन एक बात साफ है: कांशी राम की विरासत अब सियासी मैदान की सबसे बड़ी ताकत है।
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